About Hinduism and India

26 नवम्बर 2008 की खूनी काली रात को बीते तीन साल से भी ज़्यादा हो चुके। मृतकों के खून के निशान सड़कों से धुल चुके हैं। शहीदों के परिवारों को श्रध्दाञ्जली, वीरता पुरस्कार एवम् आर्थिक सहायता देने की रसमें हमारे नेता ने निभाते रहते हैं। वोटों की खातिर दिग्विजय सिहं जैसे चाटूकार उन की शहादत को अपमानित भी करते रहते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवी तथा धर्म निर्पेक्ष लोग कवि सम्मेलन और मानव श्रंखलायें बना कर पाकिस्तान को डराया धमकाया भी जा चुका है लेकिन नतीजा वहीं का वहीं है – कोई भी हम से ना तो डरा ना ही आतंकवाद रुका।

प्रधान मंत्री और उन के सहकारी मंत्री बार बार दोहराते और हम सुनते सुनते थक चुके हैं कि “अब हम आतंकवाद सहन नहीं करें गे”। प्रधान मंत्री मनमोहन सिहं ने तो सोनियां की स्वीकृति ले कर शिवराज पाटिल की जगह चिदाम्बरम को गृह मंत्री भी बनाया था लेकिन वह अपनी कारगुजारी निहत्थे और सोते हुये योगियों को खदेडने में दिखा कर सोनिया की वाहवाही बटोरने में लगे रहै और भगवा आतंकवाद का डरावा दिखाते रहै।

मनमोहन सिहँ कभी कभी पाकिस्तान को चेतावनी ही देते रहे कि अब हम सख्त कारवायी करें गे मगर ना तो कारवायी करने का मुहूरत ही निकला और ना ही पाकिस्तान टस से मस हुआ। उन्हों ने अमरीका से भी गुहार लगायी “अमेरीका या अन्य कोई भी देश पाकिस्तान पर दबाव डालें और हमें बचाने के लिये कुछ करें” ताकि कहीं हमारे हाथों में लगी मेहंदी का रंग उतर ना जाये। अब तो अमरीका भी तालिबान से समझोता करने के बहाने ढूंढ रहा है। विदेश मंत्री ने तो अभी तक सभी विकलप खुले रखे हैं जिन में सब से प्रमुख विकलप आतंकवाद सहन करते रहना है।

साँप निकलने जाने के बाद हम लकीर को ज़ोर ज़ोर से पीटते रहते हैं सुरक्षा कड़ी कर देते हैं पर आतंकवादी साँप कहीं ना कहीं से निकल ही आता है क्यों कि वह साँप समझोता एक्सप्रेस के रास्ते आ कर किसी ना किसी बिल में छिपने की जगह पा ही लेता है।

आतंकवाद से लड़ने के लिये मनमोहन-सोनियां सरकार कितनी सक्षम और कृतसंकलप है इस का अन्दाज़ा लगाना मुशकिल नहीं। पाकिस्तानियों और बंगलादेशियों को भारत लाने वाले रास्ते बन्द नहीं किये गये। आतंकवाद विरोधी कानून भी बना तो लिया लेकिन उस का इस्तेमाल भगवा आतंकवाद को बदनाम करने के लिये होना था। सुरक्षा बलों तथा पुलिस के हाथ आतंकियों के मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर हमेशा बँधे ही रहते हैं। अब किसी भी ऐसे अपराधी को पुलिस गि्रफ्तार नहीं कर सके गी जिस के अपराध की सज़ा 7 वर्ष से कम है।  सैनिकों का हाल और मनोबल इस से भी बदतर है। वह अपने परिवारों से दूरी, अस्त्र- शस्त्र की कमी और सरकार की उपेक्षा के शिकार हैं। जिस देश के सैनिकों और अफ़सरों को अपनी तनखाह और पेनशन के लिये सड़कों पर मूक प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़े उस देश के राजनेताओं को चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिये, लेकिन हमारे नेताओं में शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं। उन्हें सिर्फ़ अपनी जान की फिकर होती है। गांधी वादी अब खादी नहीं सरकारी खर्चे पर बुलेटप्रूफ़ जेकट पहनते हैं और बेबस जनता को मज़बूती से आतंकवाद का सामना करने की सलाह देते हैं।

इजराईल भारत की तुलना में बहुत छोटा देश है लेकिन अपने स्वाभिमान की रक्षा करनें में हम से कई गुना सक्षम है। वह अपने नागरिकों की रक्षा करने के लिये अमेरीका या अन्य किसी देश के आगे नहीं गिड़गिड़ाता। आतंकियों को उन्हीं के घर में जा कर पीटता है। भारत के नेता सबूतों की गठरी सिर पर लाद कर दुनियां भर के आगे अपनी दुर्दशा और स्वाभिमान-हीनता का रोना रोने निकल पड़ते हैं। कितनी शर्म की बात है जब देश की राजधानी में जहां आतंकियों से लड़ने वाले शहीद को सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया जाता है वहीं उसी शहीद की कारगुज़ारी पर जांच की मांग भी उठाई जाती है क्यों कि कुछ स्वार्थी नेताओं का वोट बेंक खतरे में पड़ जाता। दिग्विजय सिहं जैसे मूहँ फट काँग्रेस के महा सचिव और सोनियां के करीबी काँग्रेसी युवराज राहुल गाँधी को प्रशिक्षण देने में लगे हैं। आने वाले कल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है।

2008 में अमेरीका या अन्य देश इस लिये थोडे चिन्तित दिखाई पडे थे क्योंकि मुम्बई आतंकवाद में कुछ विदेशी भी मारे गये थे जिन की जान की उन देशों के लिये कुछ कीमत थी। भारतीय तो हज़ारों की संख्या में अब तक  पाकिस्तानी आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं किसी को कोई फ़रक नहीं पड़ा। हिन्दुओं की जान की तो भारत में कोई कीमत ही नहीं। उडीसा की सरकार को उच्च न्यायालय ने आदेश दिये कि अगर पटनायक सरकार इसाईओं की रक्षा नहीं कर सकती तो त्यागपत्र दे दे। जिहादी आतंकवाद के कारण हिन्दू ही मरते रहे हैं पर मनमोहन सरकार से त्यागपत्र कौन मांगे गा ?

चुनावों से पहले हर बार मनमोहन सरकार ने पहले से ही प्रचार करना शुरू करने लगते रहते हैं कि आतंकवाद को चुनावी मुद्दा ना बनाया जाये – एकता दिखायी जाये। परन्तु क्या यह मनमोहन सरकार की नाकामी नहीं कि वह अपने ही देश में  अपने नागरिकों के जान माल की और सम्मान की रक्षा करनें में असमर्थ रही है। इसलिये मनमोहन सरकार से त्यागपत्र कौन मांगे गा यह फै़सला भी मतदाताओं को अब करना होगा।

आतंकवाद के अन्धेरे में उमीद की किऱण अब स्वामी ऱामदेव ने दिखाई है। आज ज़रूरत है सभी राष्ट्रवादी, और धर्मगुरू अपनी परम्पराओं की रक्षा के लिये जनता के साथ स्वामी ऱामदेव के पीछे एक जुट हो जाय़ें और आतंकवाद से भी भयानक स्वार्थी राजनेताओं से भारत को मुक्ति दिलाने का आवाहन करें।

नागरिकों को सभी नेताओं के सुरक्षा कवच वापिस उतरवा लेने चाहियें। उन की जान देश के लिये ऐक बोझ बन चुकी है।

चाँद शर्मा

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