About Hinduism and India

हमें ऐतिहासिक सच्चाईयों से आँखें मून्द लेने की आदत पड चुकी है। हिन्दु ज़रा सोचें, आजा़दी से पहिले भारत में मुसलमानों की संख्या लगभग चार करोड. थी। क्योंकि वह हिन्दुओं के साथ नहीं रहना चाहते थे इसलिये उन्हों ने पाकिस्तान की मांग की। पाकिस्तान की मांग के पक्ष में 90 प्रतिशत मुसलमानों ने मतदान तो किया लेकिन जब घर बार छोडकर अपने मनचाहे देश में जाने का वक्त आया तो सिर्फ 15 प्रतिशत  मुसलमान ही पाकिस्तान गये थे। 75 प्रतिशत मुस्लमानों ने पाकिस्तान मिलने के बाद भी अपने घर में आराम से बैठे रहै थे। भारत के शरीर से काटे गये पाकिस्तान में हिन्दु और सिख 20 प्रतिशत, और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में हिन्दु 30 प्रतिशत थे। आज पाकिस्तान में केवल 1 प्रतिशत और बांग्लादेश में केवल 8 प्रतिशत से कम हिन्दु ही बचे हैं जो वहां नरक जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं।

विभाजन होते ही मुसलमानों ने पाकिस्तान में सदियों से रहते चले आ रहे हिन्दुओं और सिखों को मारना काटना शुरू कर दिया। वहां लाखों हिन्दुस्तानियों को केवल हिन्दु-सिख होने के कारण अपना घर-सामान सब छोड. कर पाकिस्तान से निकल कर भारत आना पडा परन्तु भारत में पाकिस्तान के पक्ष में मतदान कर के भी मुसलमान अपने घरों में सुरक्षित बने रहे।

आज भारत में मुसलमानों की संख्या फिर से 15 प्रतिशत से भी उपर बढ चुकी है। धर्म की आड़ ले कर मुसलमान राजनैतिक लाभ पाने के लिये परिवार नियोजन का विरोध करते हैं। आज मुसलमान मतदाताओं पर यह निर्भर है कि भारत में किस प्रदेश में किस राजनैतिक गठबन्धन की सरकार बने। कल जब मुस्लिम मतदाता 30 प्रतिशत हो जायें गे तो फिर वह अपनी ही सरकार बना कर ऐक और पाकिस्तान बना लें गे। आँखों पर धर्म निर्पेक्षता की पट्टी बँधी होने के कारण हिन्दूओं को कशमीर, केरल, असम और पश्चिम बंगाल में हो रही हिन्दूओं की दुर्दशा का ज्ञान ही नहीं है जहाँ हिन्दू तेजी से अल्पसंख्यक बनते जा रहै हैं।

भारत में बटवारे के पश्चात भी शैक्षिक संस्थानों और सरकारी पद नियुक्तियों में मुसलमानों के साथ बिना किसी भेद भाव के समानता का व्यवहार ही हुआ था। हिन्दु हितों का शोषण कर के भी मुसलमानों का तुष्टीकरण किया गया, किन्तु मुसलमानों ने भारत में रह कर धर्म-निर्पेक्ष्ता के लाभ तो उठाये, परन्तु उसे अपनाया कभी नहीं। केवल हिन्दु ही गांधी कथित ईश्वर अल्लाह तेरो नाम के सुर आलापते रहे, मुसलमानों ने रघुपति राघव राजा राम कभी नहीं गाया। यहां तक कि वह वन्दे मात्रम् राष्ट्रगीत का भी विरोध करते हैं और आये दिन ऐक और विभाजन की धमकी भी देते रहते हैं।

धर्म के आधार पर विभाजन के पश्चात यह तर्कसंगत था कि जो लोग हिन्दुस्तान में रहें गे उन्हें हिन्दु धर्म ओर संस्कृति के साथ मिल कर र्निवाह करना होगा। देश में ऐकता की भावना पुनः जाग्रत करने के लिये सभी देशवासियों को सामान्य कानून और एक राष्ठ्रभाषा के सूत्र में बान्धना चाहिये था, परन्तु स्वार्थी काँग्रेसी नेताओं ने विभाजित  हिन्दुस्तान में भी मुसलमानों को बराबर का ना केवल हिस्सेदार बनाया, बल्कि उन्हें मुख्य धारा से अलग कट्टर पंथी बने रहने का प्रोत्साहन भी दिया ताकि उन्हें हिन्दूओं का भय दिखा कर काँग्रेसी वोट बेंक बनाये रखा जाय। यह सब कुछ धर्म-निर्पेक्ष्ता के नाम पर हुआ। हालत यहां तक पहुंच गयी कि उन के वोट बटोरने की खातिर आज प्रधानमन्त्री मनमोहन सिहं, दिगविजय सिहँ, मुलायम सिहं, पासवान, ममता बनर्जी, लालू यादव और वामपन्थियों जैसे स्वार्थी नेता मुसलमानों के लिये विशेष आरक्षण और आर्थिक अनुदान देने के लिये स्दैव तत्पर्त हैं। हिन्दूओं के प्रति धृष्टता यहाँ तक बढ चुकी है कि कैथोलिक सोनियाँ तो भारत को हिन्दू देश ही नहीं मानती ताकि भारत का इसाई करण कर दिया जाय।

देश भक्तों के मन में यह प्रश्न क्यों नहीं उठते कि एक धर्म निर्पेक्ष देश में धर्म के आधार पर मुसलमानों और इसाईयों का तुष्टीकरण क्यों हो रहा है ? सरकार सभी देश वासियों के लिये समान आचार सहिंता क्यों नही लागू करती ? उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना क्यों की जा रही है ? इस समय खोखली धर्म निरपेक्षता पर अधारित अल्पसंख्यक तुष्टीकरण नीति और साम्यवाद हिन्दुऒं के लिये मुख्य खतरे हैं लेकिन गृहमंत्री चिदाम्बरम को और राहुल गाँधी को केवल भगवा आतँकवाद से ही खतरा लगता है क्योंकि यदि देश भक्त जाग उठे तो क्या होगा ?

धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला नहीं होता। धर्म व्यक्ति को समाज और सरकार से भी जोडता है। जब धर्म के साथ जेहादी मानसिक्ता जुड़ जाती है जो ऐक व्यक्ति को दूसरे धर्म वाले का वध कर देने के लिये उकसाये तो ऐसा धर्म व्यक्ति का निजी मामला नहीं रहता। यही बात धर्म परिवर्तन के विषय में भी लागू होती है क्यों कि ऐक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन से उस से सम्बन्धित परिवार टूटने लगते हैं और देश में ऐक ऐसा नागरिक बढ जाता है जिस की भावनात्मकिक आस्थायें विदेशों के साथ जुडने लगती हैं। ऐसे धर्मों को मानने वाला अपने धर्म के प्रभाव से देश की राजनीति, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था को भी प्रभावित करता है जैसा कि आज भारत में हो रहा है। अतः सरकार ना करे तो भी देश भक्तों को इस पर लगाम लगानी आवशयक है।

हिन्दुऒं में व्यक्तिगत अकेलापन और लाचारी की भावना घर कर चुकी है। विश्व में मुसलमानों और इसाईयों के देश बहुत सारे हैं किन्तु हिन्दुऔं के लिये केवल भारत ही अभी तक बचा हुआ है। यदि हम बे घर नहीं होना चाहते तो व्यक्तिगत तौर पर अपने देश को सम्भालने की दिशा में कुछ कदम स्वयं उठायें जैसे कि –

  • हिन्दू परिवारों में आपसी मेल-मिलाप दूारा ऐसे विषयों पर जागृति लायें।
  • अपना मत हिन्दु हित रक्षक पार्टी को ही दें।
  • हिन्दु हित रक्षक पार्टी की गति-विधियों में सहयोग तथा समय दें।
  • अपने परिवार के सदस्यों को हिन्दू इतिहास और ग्रथों की जानकारी दें।
  • हिन्दू त्यौहारों को सामूहिक  रूप से मनायें।
  • अपने सम्बन्धियों को उन की योग्यतानुसार सैना, पुलिस, एवम् सरकारी पद गृहण करने को प्रेरित करें। देश का तन्त्र उन लोगों के हाथ में रहना चाहिये जिन्हें देश की साँस्कृतिक आस्थाओं से भावनात्मिक लगाव हो।
  • हिन्दु विरोधी नेताओ, समुदायों, फिल्म कलाकारों, और समाचार पत्रों का बहिष्कार करें।

अपने देश और धर्म के लिये जान की कुर्बानी भी देनी पडती है। लेकिन अगर कोई हिन्दू इतना सब ना कर सके तो कम से कम अपना वोट तो हिन्दू समर्थक पार्टी को ही दे।

यदि हम अब भी नही जागे तो वह दिन दूर नही जब हिन्दूओं को अपने कशमीरी भाईयों की तरह भारत में भी बेघर होना पडे। कभी यह भी सोचा कि फिर कहाँ जायें गे ?

चाँद शर्मा

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Comments on: "भारत में बढती हुयी अल्पसंख्यक आबादी" (1)

  1. Shyam Yadav said:

    Good ,hum ready hai inko sabak sikhane ke liye.jai hind

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