About Hinduism and India

आज कल किसी भी शक्तिशाली देश का दूसरे देश पर सैनिक अधिकार बनाये रखना असम्भव हो गया है अतः दूसरे तरीके काम में लाये जाते हैं जैसे कि

  • आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना,
  • देश के योग्य नेताओं को गुप्त ढंग से मरवा देना,
  • देश की युवाओं में उन्हीं  के देश के साँस्कृतिक मूल्यों के प्रति अनास्था जगा कर उन्हें अपनी संस्कृति की ओर आकर्षति करना
  • या युवाओं को व्यसनों दूआरा पथ भ्रष्ट कर देना
  • इस के अतिरिक्त उस देश के शासन तंत्र में अपना कोई प्रशिक्षत जासूस घुसा देना जो उपयुक्त समय पर उस देश की सत्ता को बाहरी देश के निर्देशानुसार चलाये।

ऐसी परिस्थति में भला भारत कैसे अनछुआ रह सकता है?  साम्यवादी, मुसलिम, ईसाई और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने अपने ढंग से भारत को खण्डित कर के उस पर अधिकार जमाने के लिये प्रयत्नशील हैं। पोप ने तो साफ घोषणा कर रखी है कि इक्कीसवीं सदी में उन का लक्ष्य सम्पूर्ण ऐशिया वासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना है।

‘इन्टरनेट’ पर जानकारी के मुताबिक सोनियां मेनिओ का जन्म इटली के छोटे से शहर ट्यूरिन के लुसियानो या ऒरबेसानो नामक गांव में 9 दिसम्बर 1946 को हुआ था। उन की दो बहिनें और भी हैं। उन के पिता पहले तो इटली के कुख्यात् तानाशाह मोसोलिनी की सैना में ‘फासिस्ट’ सिपाही थे और बाद में ऐक साधारण निर्माण कार्य से जुडे हुए ठेकेदार बन गये।

सोनियां मेनिओ की प्राथमिक शिक्षा घर के पास ही रोमन कैथोलिक मिशनरियों के स्कूल में हुई और बाद में वह ‘अंग्रेज़ी पढने के लिये’ केमब्रिज इंगलैंड गई। केवल ‘अंग्रेज़ी पढने के लिये’ एक साधारण परिवार की लड़की का इंगलैंड जाना हैरानी की बात है क्यों कि इतना तो इटली में मिशनरियों के स्कूल भी कर सकते होंगे। केमब्रिज में  ही उन की मुलाकात राजीव गाँधी से ऐक ‘ग्रीक रेस्तोरां’ में हई और पहली मुलाकात में ही प्यार हो गया!

1968 में वसन्त पंचमी के दिन सोनियां मेनिओ राजीव गाँधी से विवाह कर के  सोनियां गाँधी बन गयी। उस समय इन्दिरा गाँधी भारत के राजनैतिक पटल पर पूरी तरह अधिकार जमा चुकीं थी, और उन के छोटे बेटे संजय गांधी उन के उत्तराधिकारी के रूप में उभर रहे थे। 1971 में इन्दिरा गाँधी अमेरिका तथा पशचिमी देशों की आंख की किरकिरी बन चुकीं थीं। उन को गद्दी से उतारने के लिये आन्दोलन चला, फिर ऐमरजैंसी लगी, और आखिरकार इन्दिरा को हटा कर जनता पार्टी की सरकार बनी। लेकिन तीन वर्षों के अन्तर्काल में ही इन्दिरा गाँधी अपने बेटे संजय गांधी के साथ पहले से भी अधिक लोकप्रिय हो कर दोबारा प्रधानमन्त्री पद पर आसीन हो गयीं। इस समय तक सोनियां गाँधी एक सजी-धजी, भारत की प्रधानमन्त्री की बहू बन कर परदे के पीछे रहीं। जब जनता पार्टी की सरकार तले इन्दिरा गाँधी और संजय गांधी राजनैतिक मुशकिलों में फंसे तब पता नहीं क्यों सोनियां घबरा कर अपने पति और दो बच्चों समेत इटली के दूतावास में रहने चली गयीं थी।

अचानक इन्दिरा गाँधी के उत्तराधिकारी संजय गांधी की विमान दुर्धटना में रहस्यमयी मृत्यु हो गयी। संजय गांधी की महत्वकांक्षा पत्नी मानेका गांधी तथा पुत्र वरुण को प्रधानमन्त्री निवास से निष्कास्ति होना पडा, यहां तक कि जाते समय सोनियां और उन के पति राजीव गांधी ने मानेका गांधी के सामान की तलाशी भी ले डाली। यह घटना क्रम तो तेज़ी से चला पर पता नहीं 14 वर्षों तक किस अज्ञात भय के कारण सोनियां ने भारत की नागरिकता क्यों नही ली। 1984 में यह काम पूरा हुआ। अगर कोई साधारण सरकारी पदाधिकारी किसी विदेशी से विवाह करता है तो विदेशी व्यक्ति की रिपोर्ट सरकार को दे कर सरकार से पूर्वतः स्वीकृति लेनी पड़ती है लेकिन प्रधानमन्त्री के परिवार में ही इतनी देर क्यों लगी ?

संजय के बाद राजीव गांधी का राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ। किसी भावी सम्भावना से प्रेरित हो कर सोनियां ने अंग्रेज़ी के अतिरिक्त थोड़ी बहुत हिन्दी भी सीखी और भारतीय वेशभूषा भी अपनानी शुरू कर दी थी। अचानक 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमन्त्री निवास के अन्दर ही इन्दिरा गाँधी की हत्या कर दी गयी। हत्या के तुरन्त बाद ही पकड़े गये निहत्थे हत्यारे बेअन्त सिहं को भी प्रधानमन्त्री निवास पर ही मार दिया गया। पूरे घटना क्रम की जांच रिपोर्ट में शक की सुई प्रधानमन्त्री निवास के परिचितों के आस पास तो घूमती रही लेकिन कई रहिस्य सामने नहीं खुल पाये।

प्रधान मंत्री पद के लिये ‘मिस्टिर क्लीन’ होना ही राजीव गांधी का राजनैतिक आधार था । भारत दर्शन पर जनता के बीच सोनियां ने भी जाना शुरू कर दिया लेकिन मंज़िल अभी दूर थी। राजीव गांधी की ‘मिस्टिर क्लीन’ छवि बिगाडने में सब से प्रमुख हाथ सोनियां के करीबी क्वात्रोची का रहा जो आज सभी झंझटों से मुक्त हो कर बोफर्स तोपों के सौदे की दलाली हज़म कर रहा है और भारत सरकार केवल दिखावे के तौर पर हाथ मलती रह गयी। ‘मिस्टिर क्लीन’ अपने मुंह पर कालिख पुतने के कारण सत्ता से बाहर हो गये। सत्ता में वापसी के लिये चुनाव प्रचार की जिस रैली में वह पहली बार सोनियां के बिना अकेले गये थे उसी रैली में 21 मई 1991 को उन की भी हत्या कर दी गयी। काश उस दिन सोनियां उन के समीप रही होतीं तो शायद विनाश से बच गये होते।

आसमान का छप्पर फट चुका था अतः आनन फानन ही राजीव गांधी की अंत्येष्टी होने से पहले ही कांग्रेसी चाटुकारों की टोली ने सौ वर्षों से अधिक पुरानी पार्टी की प्रधानता सोनियां गाँधी के कदमों में डाल दी जिस के लिये केवल साधारणतया अंग्रेजी-हिन्दी पढी सोनियां तैयार ही नहीं थी। नये नये वित्त मन्त्री बने मनमोहन सिहं ने तो राष्ट्रीय बजट से 200 करोड रुपये भी निकाल कर शोक संत्पत सोनियां की झोली में डाल दिये ताकि वह राजीव गांधी फाऊडेशन संस्था चला कर अपनी वेदना कम कर सकें, परन्तु जब विरोध हुआ तो सोनियां ने वह अनुदान अस्वीकार कर देना ही उचित समझा। उन को सक्रिय राजनीति में शामिल होने के न्योते मिलने लगे । उन का निवास स्थान प्रधान मन्त्री नरसिम्हा राव से रुष्ट नेताओं को सांत्वना देने का केन्द्र बनने लगा। कभी कभी सोनिया राय-बरेली और अमेठी जैसे पारिवारिक तीर्थ स्थलों के चक्कर भी लगाने लगीं जिस से उन के राजनीति में प्रविष्ट होने की अटकल पच्चू अफवाहें गर्म रहने से य़ोग्य एवं सक्ष्म प्रधान मन्त्री नरसिम्हा राव की कुर्सी डोलने लगी।

नये कांग्रेस प्रधान सीताराम केसरी बैंड मास्टर थे, तथा कांग्रेस का ढोल पीट कर चन्दा इकट्ठा करने का काम करते थे। उन्हों ने सोनियां के आगे घुटने टेक कर अद्यक्षता सोनियां को ही सौंप दी। शरद पवार, संगमा और तारिक अनवर ने सोनियां को विदेशी मूल की होने का बता कर विरोध करने की हिम्मत जुटायी तो वह तीनों दूध में से मक्खी की तरह कांग्रेस से एक ही झटके से निकाल दिये गये। गद्दी सम्भालते ही पहली बग़ावत को सोनियां ने क्रूरता से कुचल दिया ता कि दूसरा कोई हिम्मत ही ना कर सके। कुछ ही देर बाद शरद पवार की सारी हेकडी निकल गयी और वह सोनियां को भारतीय मान कर मन्त्री पद पा कर ही सन्तुष्ट हो गये और प्रधान मन्त्री बनने के सपने छोड कर क्रिकेट की राजनीति से ही अपना मन बहलाने लगे।

परदे के पीछे ही सोनियां ने कांग्रेसियों की गर्दन पकडनी सीख ली थी। साथ ही अपनी सासू जी के हाव-भाव भी अच्छी तरह से अपना लिये थे। जनता के सामने खादी की साडीयां पहनना, भीड को देख कर हाथ हिलाना, केमरे के सामने अधनंगे बच्चों के गाल थपथपाना तथा गरीबी हटाओ तरह के नारे लगवाना अब वह बहुत अच्छी तरह से सीख चुकीं थीं। इस लिये अब सरकार को आंखें दिखाने का वक्त आ गया था।

कांग्रेसियों में सिवाये गाँधी नेहरू नामों के कोई दूसरा आसरा ही नहीं था इसलिये सोनियां के साथ गांधी शब्द जुड जाने से सभी वरिष्ट कांग्रेसी नेता भी सोनियां जी से हाथ जोड कर मार्ग-दर्शन का अनुरोध करने लगे। जिस तरह शतरंज की बिसात पर कोई प्यादा चलते चलते वज़ीर बनने लगता है इसी तरह राजेश पायलट और माधव राव सिन्धिया भी शायद सोनियां को चुनौती दे पाते मगर वह दोनो अलग अलग दुर्घटनाओं का शिकार हो कर परलोक सिधार गये। ऐक तीसरे प्यादे जितेन्द्र प्रसाद ने सोनियां के सामने अध्यक्ष पद का चुनाव लडने का दुःसाहस तो किया लेकिन उस की इतनी दुर्गति हुयी कि चुनाव हारने के थोडे ही समय  पशचात वह भी सीने में दर्द ले कर स्वर्ग सिधार गये। सोनिया को चुनौती देने वाला अब कोई नही बचा था।

सब तरह से निशचिन्त हो कर सोनियां ने पहली बार जोड़ तोड़ कर के की सरकार तो ऐक वोट के अन्तर से गिरा दी लेकिन वह अपनी सरकार बनाने में सफल ना हो सकीं। निर्वाचन के बाद वाजपायी की सरकार पूरे कार्यकाल तक चली।

आखिरकार बिल्ली के भाग्य से छीका टूट ही गया। आम चुनाव के पशचात कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा मिल जाने से कांग्रेस तले सरकार तो बन गयी लेकिन सोनियां प्रधान मन्त्री ना बन सकीं। खबरें निकली कि राष्ट्रपति भवन की ओर से कुछ आपत्ति हुयी थी। जब अंगूर खट्टे निकले और सोनियां स्वयं प्रधान मन्त्री न बन सकीं तो इसे कुर्बानी का रंग दे कर वाह-वाही समेटी गयी। समस्या विकट थी। प्रधान मन्त्री बनने के बाद अगर उसी व्यक्ति ने यदि सोनियां को ही आंखें दिखा दीं तो ? सब ऊंच-नीच सोच कर  सोनियां ने ऐक ऐसा अस्तीत्वहीन व्यक्ति ढूंड लिया। अस्तीत्वहीन की तरह केंचुए को कहीं से भी मोड लो और जब चाहो पैर से मसल डालो। परदे की ओट से शासन करने पर बिना किसी जिम्मेदारी के सम्पूर्ण अधिकार भी प्राप्त हो गये, और बोझ उठाने वाले  में कोई हड्डी ही नहीं थी।

मनमोहन सिंह के मंत्री मण्डल के सभी प्रमुख मंत्रालय आज उन कांग्रेसी नेतोओं के हाथ में रहै जिन की जनता में कोई निजी साख नहीं है। वह केवल सोनियां की मेहरबानी से राज्यसभा के रास्ते से केन्द्र सरकार में ला कर बैठा दिये गये थे। दूसरे प्रमुख मंत्रालय उन नेताओं के पास रहै जो सरकार के घटक दलों से हैं और उन्हों ने केन्द्रीय मंत्री-पद काँग्रेस के साथ सांठ गांठ करने के ऐवज़ में सोनियां की स्वीकृति से मिला था। अतःसरकार का असली निर्देशन सोनियां के हाथ में रखने के लिये ऐक अत्यन्त शक्तिशाली पद बनाया गया जिसे यू पी ऐ चेयरपरसन कहा जाता है। इस पद के पास केन्द्रीय सत्ता के वास्तविक अधिकार हैं लेकिन ज़िम्मेदारी का बोझ मनमोहन सिंह के सिर पर ही है।  सभी प्रदेशों में जहां कांग्रेसी सरकारें थीं वहां पर मुख्य मन्त्री ईसाई या मुसलिम तैनात किये गये। सच्चर कमिशन की सिफारशें लागू कर के सोनियां ने मनमोहन सिंह के मुहं से कहलवा दिया कि अब देश के साधनों पर अल्पसंख्कों का पहला अधिकार है। हिन्दु समुदाय को कोई शक नहीं रहना चाहिये कि अब उन के पूर्वजों के देश पर किस का अधिकार है।

सोनियां के साथ जिन का सीधा सम्पर्क है वह सभी ईसाई तथा कट्टर हिन्दु विरोधी हैं। ऐ के एन्थोनी रक्षा मन्त्री, अम्बिका सोनी कांग्रेस महा-सचिव, आस्कर फरनाडिस केन्द्रीय नीति निर्धारण मन्त्री, मारग्रेट अलवा महाराष्ट्र प्रमुख, वालसन थाम्पु केन्द्रीय शिक्षण बोर्ड प्रमुख, जान दयाल सोनियां के मनोनीत नेशनल इन्टीग्रेशन काऊसिल सदस्य तथा कांचा इलाया यू एन ओ में भारत सरकार के सलाहकार हैं। पाठ्यक्रम की पुस्तकों में से भारतीय इतिहास को भ्रामित बनाने का काम तेज़ी से चल रहा है। भारत में चुपचाप ही ईसाईकरण तेज़ी से हो रहा है और भारतीय मनोरंजन के साधनों में खोये हुए हैं।

भारत के लिये वह ऐक मनहूस दिन था जब मनमोहन सिहं ने सोनियां के हुकम से प्रधान मन्त्री  पद की शप्थ ली और इटली वासियों के लिये ऐक गर्व का दिन था कि उन के देश की ऐक मामूली अंग्रेज़ी हिन्दी पढी महिला संसार के सब से बडे प्रजातन्त्र की कर्ता धर्ता बन बेठी । छवि प्रचार के लिये सरकारी खर्चे पर रोज़ सोनियां गांधी की फोटो वाले विज्ञापन हर दिन अखबारों में छपने लगे हैं।

शर्म की बात है कि बिना आरक्षण के ऐक साधारण हिन्दी – अंग्रेजी जानने वाली ऐक विधवा स्त्री विश्व के सब से बडे प्रजातन्त्र की कर्ता धर्ता बन सकती है लेकिन भारत की उच्च शिक्षा प्राप्त महिला इटली की प्रधान बनने का सोच भी नहीं सकती। उन्हें अपने देश में भी आरक्षण चाहिये। कम से कम अपने देश को तो सम्भाल लो। अब भी वक्त है जाग जाओ।

चाँद शर्मा

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Comments on: "भारत की पढी लिखी महिलाओं को चुनौती" (1)

  1. Brigadier(Retd) Chitranjan Sawant,VSM said:

    AUM.
    DIGGING DEEP INTO SONIA’S PAST
    By Chitranjan Sawant
    An interesting story about the rise of an Italian woman on the Indian firmament and ruling with an iron hand. She has been riding roughshod over any form of opposition to her plans. Now it is for the young leadership and common man of India to rise in protest and not let her destroy our ancient cultural values. Meek Manmohan will just carry out His Master’s Voice, that is the order that is blared. Spineless fellows have assembled around her to crush patriots like Swami Ramdev Ji. Please write about the inhuman atrocities on the Indian people at Madam’s behest.
    See your article soon.
    upvanom@yahoo.com

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