About Hinduism and India

भारत में भ्रष्टाचार जितना फैल चुका है उस स्थिति में हम ईमानदार व्यक्ति कहाँ से लायें गे जो लोकपाल या जन लोकपाल का पद सम्भाले गा ? अगर लोकपाल भी बेईमान निकला तो फिर क्या करें गे ? क्या और महालोकपाल बनायें गे ? या कहीं बाहर से आयात करें गे।

राजीव गाँधी भी तो मिस्टर क्लीन थे। मनमोहन सिंह तो ईमानदारी के प्रतीक माने जाते थे लेकिन उन दोनो के साये तले जितना भ्रष्टाचार फैला शायद भारत के इतिहास में उस की दूसरी कोई बराबरी नहीं है। फिर नया लोकपाल कोई अवतारी पुरुष होगा इस बात की कोई गारंटी नही हो सकती।

हमारे संविधान के अनुसार केन्द्र में राष्ट्रपति और राज्यों में राज्यपाल का पद सर्वोच्च है। उन पदों का काम केवल नाम-मात्र का है और खर्चा महाराजाओं जैसा। देखा जाय तो उन पदों का देश में कोई अधिकार ही नहीं है। केवल संवैधानिक अस्तीत्व ही है जिस का सरकार के काम काज पर कोई प्रभाव नहीं पडता। और तो और वह सरकार के मुख्य अंगों में जैसे कि संसद, कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका के अन्दर ताल मेल रखने की जिम्मेदारी भी नहीं निभाते। सबकुछ सेरिमोनियल ही है।

यदि राष्ट्रपति केन्द्र में और राज्यपाल अपने अपने राज्यों में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये लोकपाल का कार्यभार सम्भालें तो उस में देश का कार्य अधिक सक्ष्मता से चले गा।

जरा सोचने की बात हैः –

  • जैसे आपातकाल के समय राष्ट्रपति देश का प्रशासन अपने हाथ में ले सकते हैं उसी प्रकार यदि प्रधानमन्त्री भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जायें तो राष्ट्रपति दूसरा प्रधानमन्त्री बनने तक देश का कार्यभार अपने हाथ में क्यों नहीं ले सकते ?
  • ऱाष्ट्रपति जिस प्रकार स्शस्त्र सैनाओं को आदेश दे सकते हैं उसी प्रकार वह सी बी आई को भी निर्देश दे कर भ्रष्टाचार की जाँच क्यों नहीं करवा सकते ?

अधिकाश तौर पर केन्द्र में सत्ताधारी पार्टी राज्यपालों के पद का विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिये ही दुर्पयोग करती है या उन पदों पर रिटार्यड राजनैताओं का पुनर्वास कर देती है ताकि वह अपने बुढापे का सामान आराम से इकठ्ठा करते रहैं और पार्टी के लिये सिरदर्द ना बने क्यों कि उन में से अकसर लोगों की छवि जनता में धूमिल हो चुकी होती है। उदाहरण देने की जरूरत नहीं जनता इस बात को अच्छी तरह समझती है।

आवश्यक होगा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की नियुक्ति प्रत्यक्ष चुनाव दूारा करी जाये और उन के पद की समय सीमा संसद के चुनाव से अलग हो। इन पदों के लिये राजनैतिक दल भाग ना लें सकें और जनता चरित्रवान व्यक्तियों को चुने।

लोकपाल या जन लोकपाल के बदले हमें संविधान में परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिये ताकि नये पदों की जरूरत ही ना पडे। अभी जो स्थिति है उस में ना कभी नौ मन तेल होगा और ना ही कभी राधा नाचे गी।

चाँद शर्मा  

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Comments on: "लोकपाल और जनलोकपाल के बदले राष्ट्रपति पद की गरिमा बढायें" (2)

  1. डॉ विजय कुमार भार्गव सेवा निवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा विभाग said:

    अपने शी कहा कि राज्यपाल एवम राष्ट्रपति जनता के द्वारा चुने जाने चहिए , साथ ही प्रधान मन्त्री व जनलोकपाल बिल के अध्य्क्ष का चुनाव भी जनता द्वारा हो. एसा होने से जनता के लिये कई रास्ते हो जायेंगे.

    • मैं ने सुझाव दिया था कि राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष होना चाहिये ताकि 10 जनपथ के जरिये मनोनीत किये गये व्यक्तियों के बदले डा राजेन्द्रप्रसाद डा राधाकृष्णन और डा ऐ पी जे अबदुल कलाम जैसे व्यक्ति राष्ट्रपति के पद पर आसीन हो सके। लोकपाल या जन-लोकपाल पद की जरूरत ही नही रहैगी। राष्ट्रपति ही भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगा सकते है। यदि राष्ट्रपति पर कोई आक्षेप लगता है तो संसद में उन पर महा-अभियोग चलाया जा सकता है। हमें जरूरत लोकपालों की नहीं सख्त कानून और तेजी से काम करने वाली न्यायिक व्यवस्था की है। लोकपाल बन जाने से कालाधन वापिस नहीं आये गा।

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