About Hinduism and India

यदि आप के बच्चे भारत का प्राचीन इतिहास जानने की कोशिश में आप से यह पूछें कि पौराणिक कथाओं में दिये गये नगर अब कहां हैं तो आप उन्हें क्या उत्तर दें गे ? क्या आप बतायें गे कि अब काशी का नाम वाराणसी, अयोध्या का नाम फैज़ाबाद, पाटलीपुत्र का नाम पटना और प्रयाग का नाम इलाहबाद है ? सुनने में आया था कि श्रीनगर, अवन्तीपुर और अनन्तनाग के नामों का इसलामीकरण करने पर भी विचार हो रहा है। यदि हम अपने ऐतिहासिक नगरों की पुरानी पहचान को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करें तो काँग्रेसी, धर्म-निर्पेक्ष, साम्यवादी, कुछ इतिहासकार, ईसाई-मुसलिम संगठन और उन के प्रसार माध्यम एक स्वर में  इसे ‘भगवाकरण ’ कह कर विरोध करने लगते हैं। हमारा ही देश हम से छीन लिया गया है और हम लाचार बने बैठे हैं।

ऐतिहासिक सत्यता यह है कि मुसलमानों ने भारत में हज़ारों मन्दिरों और भवनों को ध्वस्त किया, लूटा, और उन पर कब्ज़ा कर लिया। प्रमुख मन्दिरों में से यदि काशी विश्वनाथ, मथुरा और अयोध्या को ही गिने तो पिछले कई दशकों से उन के बारे में विवाद कचहरियों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। अगर हिन्दुओं के विरुध कोई ऐसा मज़बी विवाद किसी मुसलिम देश में चल रहा होता तो वहां फैसला होने में क्या इतना समय लगता ? अयोध्या के विवाद ने कई बार उग्र रूप भी लिया है, कई लोगों की जान भी गई है तो न्यायालय में लगातार सुनवाई कर के क्यों नही इस को निपटा दिया जाता? कांग्रेसियों के लिये तो राम ऐक काल्पनिक पात्र थे – लेकिन हिन्दु समाज की आस्था तो राम के साथ उस समय से जुड़ी है जब इस्लाम नाम का कोई धर्म ही विश्व में नहीं था। मुग़ल विजेता बाबर हर दृर्ष्टी से भारत में मुसलसानों के लिये भी ऐक आक्रान्ता होना चाहिये था क्यों कि उस समय हिन्दुस्तान पर तो अन्य मुसलिम सुलतान इब्राहीम लोदी का शासन था। फिर राम की जन्म भूमि पर ऐक आक्रान्ता के बनाये हुये विवादित ढाँचे को क्यों रहने दिया जाये ? क्या मक्का–मदीना में कोई मन्दिर या गिरजा बन सकता है ? अगर नहीं तो फिर राम जन्म भूमि अयोध्या में भी किसी आक्रान्ता की कोई मसजिद नही होनी चाहिये।

आज भारत के सभी छोटे बड़े नगरों में सड़क के बीच में बने कई मज़ार देखे जा सकते हैं और कोई सरकार यातायात सुधारने के लिये भी उन्हें वहां से हटाने की हिम्मत नहीं कर सकती। लेकिन इस की तुलना में आज की काँग्रेसी सरकार राम-सेतु रक्षा समर्थकों से राम-सेतु निर्माण के सबूत मांगती है। सरकार के सहयोगी करुणानिधि ध्रष्टतापूर्वक टिप्पणी करते हैं कि राम ने कौन से कालेज से इनजिनियरिंग की डिग्री ली थी ? ऐसे नेताओं से अगर पूछा जाय कि आप के पास क्या सबूत है कि आप के दादा और पर-दादा भी कभी इस धरती पर जन्में थे ? अगर जन्मे थे तो फिर उन के सिक्के, शिलालेख क्यों नही हैं। अगर उन के पास पिछले दो – सौ वर्षों के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं तो राम के ऐतिहासिक प्रमाण कैसे दिये जा सकते हैं ? हिन्दू आस्थाओं के साथ इस तरह के खिलवाड़ क्यों सहन किये जा रहे हैं ?

भारत के प्राचीन इतिहास को खोजने के लिये हमें संस्कृत, पाली और तिब्बतियन भाषाओं  की प्राचीन पुस्तकों का अध्ययन करना होगा क्यों कि हमारे इतिहास के मूल ग्रंथ और स्थल तो मुसलसालों ने अपने शासन काल में ‘कुफ्र’ बता कर नष्ट कर दिये थे। भारत की धर्म निर्पेक्ष कांग्रेसी सरकार पुरानी मसजिदों, मकबरों और पाकिस्तान जा चुकी उर्दू भाषा का भारत में पुनर्वास और मदरस्सों के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। मसजिदों के मौलवियों को सरकारी कोष से वेतन देती है ताकि वह आने वाली मुसलिम पीढीयों को भी कुरान शरीफ़ पढा कर उन्हें हिन्दुओं के विरुध जिहाद करने की शिक्षा देते रहें। लेकिन अगर किसी सरकारी स्कूल के पाठ्यक्रम में व्यायाम के तौर सूर्य-नमस्कार आसन सिखाने, या ऐकता की भावना जाग्रत करने के लिये राष्ट्र गीत वन्देमात्रम् गाने को कहा जाये या विद्यार्थीयों को संस्कृत का कोई श्लोक कंठस्थ करवाया जाये तो वह शिक्षा का ‘भगवाकरण ’ कह कर आपत्तीजनक बना दिया जाता है। आखिर हम मुसलिम विरोध को इतना महत्व क्यों दे रहे हैं कि हम ने अपनी पुरानी पहचान से अपना नाता ही तोड़ लिया है ? हमारी नयी पीढी़यां अपने पुरखों के बारे में जानने के लिये अब किस देश में जायें गी ?

देश का बटवारा होने के बाद काँग्रेस की धर्म-निर्पेक्ष सरकार ने पाकिस्तान बनवाने के अतिरिक्त भारत का ही  ऐक अन्य प्रदेश कशमीर भी पूर्णतया मुसलमानों के हवाले कर दिया। भारत वासियों को कशमीर की सुरक्षा के लिये जान और कशमीर के पालन के लिये टैक्स तो देने पड़ते हैं लेकिन वह कशमीर में दो गज़ ज़मीन भी नहीं खरीद सकते। हज़ारों वर्षों से चले आ रहे कशमीर के मूल निवासी कशमीरी हिन्दुओं को जिहादी मुसलमानों ने वहां से मार काट के निकाल दिया और भारत की सरकार उन्हें वहां उन का हक़ वापिस नहीं दिला सकी। आज वैदिक साहित्य की जन्म भूमि कशमीर से हिन्दुओं का नामो-निशान मिटाने का प्रयत्न काँग्रेस की धर्म-निर्पेक्ष सरकार की छत्र छाया के नीचे ही हो रहा है और कशमीर को मुसलिम राज्य बनाया जा रहा है। आने वाली पीढी को यह विशवास दिलाना कठिन हो गा कि कभी अफ़ग़ानिस्तान हिन्दू देश था और उस का नाम आर्याना तथा गान्धार था। जैसे पाकिस्तान, बांगलादेश तथा नेपाल भी हिन्दू देश थे पर अब नहीं, इसी तरह अब कशमीर की बारी है और कांग्रेस सरकार की मनोस्थति और कार्य-क्षमता विशवास-जनक नहीं है।

जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के आग्रह पर कशमीर की मुस्लिम छवि बनाये रखने के लिये धारा 370 संविधान में रखवा दी थी किन्तु भारत की हिन्दू छवि के लिये क्या किया। आज राहुल को अपने आप को हिन्दुस्तानी कहने पर शर्म लगती है और उस की मां काँग्रेस प्रेजीडेन्ट की हैसियत से कहती हैं भारत हिन्दू देश नहीं है। क्या सभी काँग्रेसी हिन्दू विरोधी हैं? हिन्दूस्तान में इसाईकरण तो काँग्रेस के आशीर्वाद से ही हो रहा है।

अब इस से अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि केवल मुसलमानों को खुश रखने के लिये हम उन वीरों की गौरव-गाथाओं को अपनी पाठ्य-क्रम और सार्वजनिक गतिविधियों से निष्कासित करते जा रहे हैं जिन्हों ने अपने देश-धर्म की खातिर अपना जीवन दान किया। महा वीर हेम चन्द्र विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप, वीर शिवा जी, वीर बालक हक़ीकत राय का उल्लेख शिक्षा पुस्तकों में या तो होता ही नहीं या उन्हें ‘अकबर महान’ जैसों की तुलना में नीचे कर दिया जाता है। भारत के इतिहास को ‘धर्म-निर्पेक्ष बनाने’ के लिये तथ्यों को हटाने या भ्रामित करने का काम कुछ ‘धर्म-निर्पेक्ष ’ इतिहासकार तत्परता से कर रहे हैं। पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने और मुसलिम वोट बैंक को सन्तुष्ट रखने के लिये ‘धर्म-निर्पेक्ष” कांग्रेसी सरकार ने 1971 के भारत-पाक युद्ध तथा कारगिल युद्ध के उपल्क्ष में की जाने वाली परम्परागत सैनिक विजय-दिवस परैड को भी बंद कर दिया है। देश के वीरों की इस से अधिक उपेक्षा और क्या की जा सकती है ?

इस में कोई संशय नहीं कि जिहादी मुसलमानों को भारत के गौरव-मय प्राचीन इतिहास, वैदिक साहित्य और उन के विचार से ‘काफ़िर’ सूरमाओं से कोई सरोकार ना कभी था, ना है, और ना कभी होगा। भारत में रहते हुये भी वह अपने मार्ग दर्शन के लिये अरब देशों की और देखते हैं, हिन्दु विरोधी पाकिस्तान को अपना हितैषी मानते हैं और हिंसात्मक जिहाद कर के भारत में पुनः इसलामी राज्य स्थापित करने के स्वप्न देखते हैं। समूचे विश्व में मुसलमानों की यही मानसिक्ता काम कर रही है। आखिर क्यों कर हम अपनी उपलब्धियां, धार्मिक मर्यादायें, अपने पूर्वजों का यश, और अपने पहिचान चिन्ह अपने आप ही मिट्टी में मिलाते जा रहे हैं ? अपनी ऐतिहासिक धरोहर की रक्षा हम क्यों नहीं कर पा रहे ? क्या हमारा आने वाली पीढ़ी ओर कोई उत्तरदात्वि नहीं ? अगर है तो हमें अपने देश को हिन्दू राष्ट्र कहने और बनाने में कोई हिचकचाहट या भय नहीं होना चाहिये।

चाँद शर्मा

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