About Hinduism and India

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जिन गीतों ने राष्ट्रभावनाओं को जगाया था उन में मुख्य थे ‘पगडी सम्भाल जट्टा’, ‘ छई’, ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’, ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’, ‘कदम कदम बढाये जा खुशी के गीत गाये जा’, ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ और ‘वन्दे मात्रम’। इन गीतों में ‘जन गण मन अधिनायक जय है’ का कोई योग्दान नहीं था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी और उस के पश्चात के ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के शासन में 1911 तक अंग्रेजों की राजधानी कलकत्ता में रही थी। 1857 की क्रान्ति के पश्चात आधुनिकी करण के नाम पर अंग्रेजों ने कुछ औपचारिक सुधार भी किये थे जिन का मूल उद्देष्य उपनेष्वादी तन्त्र को मजबूत करना था। लिखित कानून लागू कर के अंग्रेजों ने कचहरियों तथा न्यायालयों की स्थापना की गयी थी। कलक्त्ता में अंग्रेजों को हिन्दी सिखाने के लिये  ऐक फोर्ट विलियम नाम का कालेज खोला गया था  जिन में प्राध्यापकों के रूप में राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द, सदल मिश्र, लल्लू लाल और इंशा अल्ला खां जैसे हिन्दी के गद्य लेखकों को रखा गया था। आगे चल कर हिन्दी की खडी बोली का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तथा आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी के सौजन्य से आरम्भ हुआ था । उस समय अंग्रेज़ हिन्दी को रोमन लिपी में ही लिखते और पढते थे। हिन्दुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य के लिये कलर्क तैय्यार करने के लिये मैकाले शिक्षा पद्धति शुरु की गयी थी जिस का मुख्य  

उद्देष्य हिन्दुस्तानियों के मन में उन की अपनी संस्कृति के प्रति नकारात्मिक तथा अंग्रेजी संस्कृति के प्रति आकर्षण पैदा करना था।

ऐक अंग्रेज ऐ ओ ह्यूम ने मैकाले पद्धति से पढे लिखे हिन्दुस्तानियों के मन बहलावे के लिये ऐक नया अर्ध राजनैतिक संगठन काँग्रेस के नाम से आरम्भ किया था जिस का मुख्य उद्देश्य मामूली पढ लिखे भारतियों को सरकारी तन्त्र का हिस्सा बन कर जन साधारण का प्रतिनिधत्वभ करने से दूर रखना था ताकि वह अपनी राजनैतिक आकाँक्षाओं की पूर्ति अंग्रेजी खिलोनों से कर के संतुष्ट रहैं। अंग्रेजों के संरक्षण में बने इस राजनैतिक संगठन से उन्हें कोई भय नहीं था। उसी काल में कलकत्ता का ऐक टैगोर (ठाकुर) परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था जिस के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे। उन में मुख्य थे अवनींद्र नाथ टैगोर तथा उन के छोटे भाई  रविन्द्र नाथ टैगोर।

कलकत्ता के बदले दिल्ली को राजधानी बनाने के कई राजनैतिक कारण थे परन्तु जब 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाया गया तो इंग्लैंड का राजा जार्ज पंचम अपनी कालोनी को देखने के लिये हिन्दुस्तान आया था। उन दिनों पंडित मोतीलाल नेहरू इलाहबाद के प्रमुख वकील थे और अंग्रेजी रंग ढंग से ही रहते थे। उन्हे जार्ज पंचम के लिये गठित स्वागत स्मिति में चुना गया था। 

मोतीलाल नेहरू ने रविंद्रनाथ टैगोर से जार्ज पंचम के स्वागत के लिये ऐक गीत लिखवाया था जिस का उद्देश विदेशी सम्राट (ऐम्परर जोर्ज पंचम) के प्रति हिन्दुस्तानियों को अपनी कृतज्ञ्यता व्यक्त करते हुये उस के आलौकिक गुणों का बखान कर के अपने शासक के प्रति आभार प्रगट कर के उस का स्वागत करना था। अतः रविन्द्र नाथ टैगोर ने जो गीत लिखा उसके बोल थे “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। उस गीत के पाँच पद्य थे जिन में अंग्रेजी सम्राट जोर्ज पंचम और अंग्रेजी साम्राज्य का गुणगान है। गीत के प्रथम पद्य का अर्थ कुछ इस प्रकार हैः-  

“भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा (महाराष्ट्र), द्रविड़ (दक्षिण भारत), उत्कल (उड़ीसा), बंग (बंगाल) तथा विन्ध्य (सेन्ट्रल इडिया का कुछ भाग) हिमाचल (उत्तर के कुछ पहाडी क्षेत्र जैसे शिमला आदि) और यमुना और गंगा नदियों के बीच का भाग – ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। “

दिल्ली का नाम न्यू डेल्ही रखा गया था और सम्राट के स्वागत के लिये ईंडिया गेट बनाया गया था। स्वागत समारोह में “जन गण मन अधिनायक जय है ” गाया गया था जिसे सुन कर ब्रिटिश सम्राट का स्वयं पर गर्वित होना स्वाभाविक था।

यह ऐक उल्लेखनीय तथ्य है कि स्वतन्त्रता संग्राम के समय क्रान्तिकारियों का लोकप्रिय गान बंकिमचन्द्र चैटरजी रचित वन्दे मात्रम था जो उन के क्रान्तिकारी उपन्यास आनन्द मठ का गान है। काँग्रेस में कालान्तर ऐक गर्म दल और ऐक नर्म दल के नाम के दो गुट बन चुके थे। गर्मदल के प्रमुख नेता बाल गंगाधर तिलक थे जिन के सहयोगियों का रवैया अंग्रेजों के प्रति कठोर था। उन्हें अंग्रेजी यातनायें भी सहनी पडीं थी। वह वन्दे मात्रम का गान करते थे। उन की तुलना में  ऐक नर्म दल भी था जिस के जाने पहचाने नेता गोपाल कृष्ण गोखले और मोती लाल नेहरू आदि थे।  इसी नर्म दल के कुछ गिनेचुने काँग्रेसी वन्देमात्रम के बदले स्वागत गीत को गाना सुरक्षित समझ कर गाते रहते थे।

बटवारे के पश्चात संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। लेकिन जवाहरलाल नेहरू के मन में कुछ और ही था और उन्हों ने इसमें भी राजनीति कर डाली।

उन्हों ने पहले तो अपने अभिभावक मोहनदास कर्मचन्द गांधी को राष्ट्रपिता मनोनीत किया। फिर नेहरु जी को चिन्ता लगी कि अंग्रेजों के राष्ट्रगीत “लांग लिव दि किंग” की तरह का ही एक राष्ट्रगान भारत के लिये भी होना चाहिये। बस नेहरू जी ने वन्दे मात्रम के बदले बिना जनता की सहमति लिये स्वागत गीत ‘जन गण मन अधिनायक जय है ’ को राष्ट्रगीत घोषित करवा दिया। अपने आप को धर्म निर्पेक्ष प्रचारित करने के लिये नेहरू जी ने मुसलमानों की नाराज़गी का बहाना तराशा और फिर उसे काँग्रेसियों के माध्यम से फैलाया।

दोनो गीतों में अन्तर यह है कि जहाँ वन्देमात्रम् स्वतन्त्रता संग्राम में स्वतन्त्रता सैनानियों को प्रेरित करता रहा था वहीं ‘जन गण मन’ मौलिक तौर पर ऐक स्वाग्त गीत था। इस गान में केवल उन्हीं प्रदेशों के नाम है जो सन् 1911 में इंगलैन्ड के सम्राट के ग़ुलाम थे। आज़ादी के इकसठ वर्ष बाद भी इस राष्ट्रगान का अर्थ कितने भारतीय समझते हैं यह आप स्वयं अपने ही दिल से पूछ लीजिये।

नेहरु जी ने वन्दे मात्रम को इस बहाने से भी अस्वीकृत किया था कि उस की धुन मिलिट्री बैंड  की मार्चिंग बीट (लय) पर नहीं बजायी जा सकती। उन के उस कथन को  ऐक मुस्लिम, परन्तु सच्चे धर्म निर्पेक्ष महान संगीतकार नौशाद ने नेहरु के जीवन काल में ही गल्त साबित कर दिखाया था। फिल्म लीडर के क्रेडिट टाईटल्स में वन्दे मात्रम की धुन नौशाद साहब ने मार्चिंग बीट पर ही आधारित करी थी जिस में प्रथम पद गाने के पश्चात आरकेस्ट्रा वही संगीत बजाता रहता है।

बटवारे के छः दशक बाद भी भारत में रहने वाले मुस्लिम वन्देमात्रम को गाने में आपत्ति करते हैं और कांग्रेस की सरकार वोटबैंक राजनीति के कारण इस क्रान्तियुग के प्रेरणादायक राष्ट्रगान को उचित सम्मान नहीं दिलवा पाई है। हम बिना अर्थ समझे जन गण मन को गाते चले जा रहै हैं जो राष्ट्र भावनाओं का प्रगटी करण नहीं करता।

हिन्दू भावनाओं की अनदेखी तो काँग्रेस हमेशा करती ही रही है परन्तु सोचने की बात है अगर मुस्लिम कट्टरवादियों की तरह हिन्दू भी स्वागत गीत ‘जन गण मन’ का विरोध करना शुरु कर दे तो क्या होगा?

 चाँद शर्मा

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