About Hinduism and India

Archive for the ‘Hindi’ Category

राष्ट्रीय भावनाओं की अनदेखी क्यों ?

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जिन गीतों ने राष्ट्रभावनाओं को जगाया था उन में मुख्य थे ‘पगडी सम्भाल जट्टा’, ‘ छई’, ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’, ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’, ‘कदम कदम बढाये जा खुशी के गीत गाये जा’, ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ और ‘वन्दे मात्रम’। इन गीतों में ‘जन गण मन अधिनायक जय है’ का कोई योग्दान नहीं था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी और उस के पश्चात के ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के शासन में 1911 तक अंग्रेजों की राजधानी कलकत्ता में रही थी। 1857 की क्रान्ति के पश्चात आधुनिकी करण के नाम पर अंग्रेजों ने कुछ औपचारिक सुधार भी किये थे जिन का मूल उद्देष्य उपनेष्वादी तन्त्र को मजबूत करना था। लिखित कानून लागू कर के अंग्रेजों ने कचहरियों तथा न्यायालयों की स्थापना की गयी थी। कलक्त्ता में अंग्रेजों को हिन्दी सिखाने के लिये  ऐक फोर्ट विलियम नाम का कालेज खोला गया था  जिन में प्राध्यापकों के रूप में राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द, सदल मिश्र, लल्लू लाल और इंशा अल्ला खां जैसे हिन्दी के गद्य लेखकों को रखा गया था। आगे चल कर हिन्दी की खडी बोली का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तथा आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी के सौजन्य से आरम्भ हुआ था । उस समय अंग्रेज़ हिन्दी को रोमन लिपी में ही लिखते और पढते थे। हिन्दुस्तान में अंग्रेजी साम्राज्य के लिये कलर्क तैय्यार करने के लिये मैकाले शिक्षा पद्धति शुरु की गयी थी जिस का मुख्य  

उद्देष्य हिन्दुस्तानियों के मन में उन की अपनी संस्कृति के प्रति नकारात्मिक तथा अंग्रेजी संस्कृति के प्रति आकर्षण पैदा करना था।

ऐक अंग्रेज ऐ ओ ह्यूम ने मैकाले पद्धति से पढे लिखे हिन्दुस्तानियों के मन बहलावे के लिये ऐक नया अर्ध राजनैतिक संगठन काँग्रेस के नाम से आरम्भ किया था जिस का मुख्य उद्देश्य मामूली पढ लिखे भारतियों को सरकारी तन्त्र का हिस्सा बन कर जन साधारण का प्रतिनिधत्वभ करने से दूर रखना था ताकि वह अपनी राजनैतिक आकाँक्षाओं की पूर्ति अंग्रेजी खिलोनों से कर के संतुष्ट रहैं। अंग्रेजों के संरक्षण में बने इस राजनैतिक संगठन से उन्हें कोई भय नहीं था। उसी काल में कलकत्ता का ऐक टैगोर (ठाकुर) परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था जिस के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे। उन में मुख्य थे अवनींद्र नाथ टैगोर तथा उन के छोटे भाई  रविन्द्र नाथ टैगोर।

कलकत्ता के बदले दिल्ली को राजधानी बनाने के कई राजनैतिक कारण थे परन्तु जब 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाया गया तो इंग्लैंड का राजा जार्ज पंचम अपनी कालोनी को देखने के लिये हिन्दुस्तान आया था। उन दिनों पंडित मोतीलाल नेहरू इलाहबाद के प्रमुख वकील थे और अंग्रेजी रंग ढंग से ही रहते थे। उन्हे जार्ज पंचम के लिये गठित स्वागत स्मिति में चुना गया था। 

मोतीलाल नेहरू ने रविंद्रनाथ टैगोर से जार्ज पंचम के स्वागत के लिये ऐक गीत लिखवाया था जिस का उद्देश विदेशी सम्राट (ऐम्परर जोर्ज पंचम) के प्रति हिन्दुस्तानियों को अपनी कृतज्ञ्यता व्यक्त करते हुये उस के आलौकिक गुणों का बखान कर के अपने शासक के प्रति आभार प्रगट कर के उस का स्वागत करना था। अतः रविन्द्र नाथ टैगोर ने जो गीत लिखा उसके बोल थे “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। उस गीत के पाँच पद्य थे जिन में अंग्रेजी सम्राट जोर्ज पंचम और अंग्रेजी साम्राज्य का गुणगान है। गीत के प्रथम पद्य का अर्थ कुछ इस प्रकार हैः-  

“भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा (महाराष्ट्र), द्रविड़ (दक्षिण भारत), उत्कल (उड़ीसा), बंग (बंगाल) तथा विन्ध्य (सेन्ट्रल इडिया का कुछ भाग) हिमाचल (उत्तर के कुछ पहाडी क्षेत्र जैसे शिमला आदि) और यमुना और गंगा नदियों के बीच का भाग – ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। “

दिल्ली का नाम न्यू डेल्ही रखा गया था और सम्राट के स्वागत के लिये ईंडिया गेट बनाया गया था। स्वागत समारोह में “जन गण मन अधिनायक जय है ” गाया गया था जिसे सुन कर ब्रिटिश सम्राट का स्वयं पर गर्वित होना स्वाभाविक था।

यह ऐक उल्लेखनीय तथ्य है कि स्वतन्त्रता संग्राम के समय क्रान्तिकारियों का लोकप्रिय गान बंकिमचन्द्र चैटरजी रचित वन्दे मात्रम था जो उन के क्रान्तिकारी उपन्यास आनन्द मठ का गान है। काँग्रेस में कालान्तर ऐक गर्म दल और ऐक नर्म दल के नाम के दो गुट बन चुके थे। गर्मदल के प्रमुख नेता बाल गंगाधर तिलक थे जिन के सहयोगियों का रवैया अंग्रेजों के प्रति कठोर था। उन्हें अंग्रेजी यातनायें भी सहनी पडीं थी। वह वन्दे मात्रम का गान करते थे। उन की तुलना में  ऐक नर्म दल भी था जिस के जाने पहचाने नेता गोपाल कृष्ण गोखले और मोती लाल नेहरू आदि थे।  इसी नर्म दल के कुछ गिनेचुने काँग्रेसी वन्देमात्रम के बदले स्वागत गीत को गाना सुरक्षित समझ कर गाते रहते थे।

बटवारे के पश्चात संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई। लेकिन जवाहरलाल नेहरू के मन में कुछ और ही था और उन्हों ने इसमें भी राजनीति कर डाली।

उन्हों ने पहले तो अपने अभिभावक मोहनदास कर्मचन्द गांधी को राष्ट्रपिता मनोनीत किया। फिर नेहरु जी को चिन्ता लगी कि अंग्रेजों के राष्ट्रगीत “लांग लिव दि किंग” की तरह का ही एक राष्ट्रगान भारत के लिये भी होना चाहिये। बस नेहरू जी ने वन्दे मात्रम के बदले बिना जनता की सहमति लिये स्वागत गीत ‘जन गण मन अधिनायक जय है ’ को राष्ट्रगीत घोषित करवा दिया। अपने आप को धर्म निर्पेक्ष प्रचारित करने के लिये नेहरू जी ने मुसलमानों की नाराज़गी का बहाना तराशा और फिर उसे काँग्रेसियों के माध्यम से फैलाया।

दोनो गीतों में अन्तर यह है कि जहाँ वन्देमात्रम् स्वतन्त्रता संग्राम में स्वतन्त्रता सैनानियों को प्रेरित करता रहा था वहीं ‘जन गण मन’ मौलिक तौर पर ऐक स्वाग्त गीत था। इस गान में केवल उन्हीं प्रदेशों के नाम है जो सन् 1911 में इंगलैन्ड के सम्राट के ग़ुलाम थे। आज़ादी के इकसठ वर्ष बाद भी इस राष्ट्रगान का अर्थ कितने भारतीय समझते हैं यह आप स्वयं अपने ही दिल से पूछ लीजिये।

नेहरु जी ने वन्दे मात्रम को इस बहाने से भी अस्वीकृत किया था कि उस की धुन मिलिट्री बैंड  की मार्चिंग बीट (लय) पर नहीं बजायी जा सकती। उन के उस कथन को  ऐक मुस्लिम, परन्तु सच्चे धर्म निर्पेक्ष महान संगीतकार नौशाद ने नेहरु के जीवन काल में ही गल्त साबित कर दिखाया था। फिल्म लीडर के क्रेडिट टाईटल्स में वन्दे मात्रम की धुन नौशाद साहब ने मार्चिंग बीट पर ही आधारित करी थी जिस में प्रथम पद गाने के पश्चात आरकेस्ट्रा वही संगीत बजाता रहता है।

बटवारे के छः दशक बाद भी भारत में रहने वाले मुस्लिम वन्देमात्रम को गाने में आपत्ति करते हैं और कांग्रेस की सरकार वोटबैंक राजनीति के कारण इस क्रान्तियुग के प्रेरणादायक राष्ट्रगान को उचित सम्मान नहीं दिलवा पाई है। हम बिना अर्थ समझे जन गण मन को गाते चले जा रहै हैं जो राष्ट्र भावनाओं का प्रगटी करण नहीं करता।

हिन्दू भावनाओं की अनदेखी तो काँग्रेस हमेशा करती ही रही है परन्तु सोचने की बात है अगर मुस्लिम कट्टरवादियों की तरह हिन्दू भी स्वागत गीत ‘जन गण मन’ का विरोध करना शुरु कर दे तो क्या होगा?

 चाँद शर्मा

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आज ज़रूरत है भगवान परशुराम की

भगवान परशुराम जयन्ती केवल एक जातीय पर्व बन कर रह गया है क्यों कि सिर्फ ब्राह्मण समाज ही हर वर्ष भगवान परशुराम जी के जन्म – दिवस को औपचारिक रूप से समस्त भारत में मनाता है और फिर अगले वर्ष तक उन्हें भूल भी जाता है। उन के चरित्र का सही मूल्यांकन तथा प्रदर्शन आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग के सामने नहीं किया गया है।

भगवान परशुराम ऐसे युग पुरूष हैं जो त्रैता युग (रामायण-काल) से दुआपर युग (महाभारत काल) तक उल्लेखनीय रहे हैं, लेकिन उन को एक महा क्रोधी के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है। अकसर राम लीलाओं में ऐक सनकी किस्म के पात्र के रूप में दर्शक लक्षमण परशुराम संवाद की नोंक झोंक का आनन्द ले लेते हैं। सत्यता यह है कि वालमीकि रचित रामायण में ऐसा कोई दृष्य चर्तित नहीं है, परन्तु गोस्वामि तुलसीदास रचित राम चरित मानस में लक्षमण परशुराम संवाद दिया गया है। लगता है उसी को आधार बना कर नाट्यकारों ने मसालेदार संवाद और जोड दिये होंगे जिस के कारण भगवान परशुराम जैसे प्राकर्मी एवम् सदाचारी युग पुरूष का व्यकि्तत्व केवल ऐक भ्रामित रूप में सिमट कर रह गया।  

कहा जाता है परशुराम जी ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि की मृत्यु का बदला लेने के लिये इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। परन्तु यदि इस बात को सत्य माना जाय तो फिर रघुकुल के महाराज दशरथ और मिथिला के महाराज जनक कैसे उन के क्रोध से बच गये ? परशुराम जी क्षत्रिय राजकुमार राम के आगे क्यों नत्-मस्तक हो गये?

यह भी कहा जाता है कि परशुराम जी ने क्षत्रियों को शस्त्र विद्या ना सिखाने का प्रण भी लिया था जिस के कारण कर्ण को ब्राह्मण बन कर उन से छल कर के ब्रह्मास्त्र प्राप्त करना पड़ा था और भेद खुल जाने पर कर्ण को शाप ग्रस्त भी होना पड़ा था। परन्तु यदि उन्हों ने कोई ऐसा प्रण लिया होता तो वह क्षत्रिय महारथी भीष्म को अपना शिष्य स्वीकार कर के शस्त्र विद्या कभी ना सिखाते।

वास्तव में परशुराम जी ने पथ भ्रष्ट शासक वर्ग के अन्याय और दुष्चरित्र का दमन किया और कुछ क्षत्रियों को उन के अधर्म और अत्याचार के कारण दँडित किया था। वह क्रोधी नहीं थे, अपितु संवेदनशील हो कर उन्हों ने अम्बालिका के साथ हुये अन्याय का प्रतिकार लेने के लिये भीष्म पितामाह जैसे महारथी से युध भी किया था। उन्हों ने ही सर्वप्रथम संत-सिपाही का कीर्तिमान स्थापित किया। बाद में अंग्रेज़ी साहित्य में भी इसाई धर्म की परम्पराओं और इसाई अबलाओं की रक्षा के लिये नाईट्स उल्लेखनीय पात्रों के रूप में चर्चित हुये। सिख गुरू जनों ने भी पीरी और मीरी की परम्परा अपनायी।

भ्रान्तिवश आज केवल जन्म के आधार पर ही जातीय वर्गीकरण किया जाता है और कर्म तथा शैक्षिक योग्यता को अनदेखा कर दिया जाता है। केवल जन्म के आधार पर अपने आप को ब्राह्मण कहने वालों में से कई व्यक्ति दुराचर्ण भी करते हैं, शैक्षिक योग्यता से ब्राह्मण कहलाने वाले दुष्कर्म होते देख कर उसे अनदेखा कर देने में ही अपनी सुरक्षा और भलाई समझते हैं। क्या इस प्रकार के ब्राह्मणों को भगवान परशुराम का वंशज कहलाना शोभा देता है? अतः आज के संदर्भ में शिक्षत वर्ग के लोगों को अपने सामाजिक उत्तरदाइत्व का मूल्यांकन करने की अति अधिक आवशक्ता है।

आवशक्ता है कि सही मायनों में देश के शिक्षित वर्ग के लोग सामाजिक अन्याय, अपराध और पथभ्रष्ट शासक वर्ग के विरुध भगवान परशुराम की दिखाई हुई राह पर चल कर दिखायें। संवेदनशील बनें, सामाजिक बुराईयां देख कर भी निष्क्रिय ना रहें, हताश होने के बजाये क्रियावन्त हो कर उन्हें नष्ट करने के लिये अग्रसर हों। आज भारत को फिर से ज़रूरत है भगवान परशुराम के सच्चे वंशजों की ।

अगर आज के युग में भगवान परशुराम होते तो वह भ्रष्ट नेताओं और काँग्रेस के धर्मनिर्पेक्ष नेताओं का संहार अवशय करते जिन्हों ने देश और धर्म को अपनी आचार हीनता से क्षतिग्रस्त कर छोडा है। आज भारत को स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के साथ भगवान परशुराम की भी सख्त ज़रूरत है।

चाँद शर्मा

अन्ना हजारे गाँधीवाद के बदले राष्ट्रवाद अपनाये

देश में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, तुष्टिकरण फैलाने की जिम्मेदार काँग्रेस ही है जिस की मुखिया सोनिया गाँधी है। सोनिया नेहरू और गाँधी का नाम लेकर देश पर परोक्ष रूप से शासन कर रही है और उसे इसाई करण की ओर ले जा रही है।  उसी सोनिया के विरुद्ध अन्ना हजारे ने ऐक शब्द नहीं बोला। क्या वह इतने भोले हैं कि नहीं जानते करपशन के पीछे कौन है। किसी अनपढ से भी सवाल करो गे तो वह बता देगा कि करप्ट कौन कौन हैं। सरकार ने आज तक काले धन वालों के नामों का खुलासा नहीं किया। क्या अन्ना ने इस बारे में कभी कुछ कहा ।

अन्ना स्वामी अग्निवेश के साथ स्वामी रामदेव के रामलीला मैदान की नवम्बर 2010 वाली रैली में आये थे। वहाँ जुटी भीड को देख कर वाहवाही लेने के लिये अन्ना ने पहले ही अपना भूख हडताली आन्दोलन अप्रैल में शुरु कर दिया था। मीडिया ने अन्ना को हीरो बना दिया और कहा कि सरकार तो हिल गयी। पाँच दिन के बाद ही सुलह हो गयी।  अग्निवेश और केजरीवाल ने कहा कि सरकार ने तो जरूरत से ज्यादा दे दिया।

जिस ने आन्दोलन को सींचा था उन्ही स्वामी रामदेव के हाथों से आन्दोलन की वाहवाही की फूलमाला अन्ना के गले में जा पडी। अन्ना ने फिर स्वामी राम देव की ओर देखा भी नहीं। वह तो स्वामी रामदेव  जी का बडप्पन था  कि उन्हों ने कुछ नहीं बोला और अपना कार्य करते रहै हैं। सरकार ने स्वामी रामदेव के साथ जो सलूक किया और अन्ना के लिये कैसा भव्य आयोजन रामलीला मैदान में करवाया यह छुपा नहीं है और सबूत है कि काँग्रेस का पिठ्ठू कौन है। अन्ना ने तो शहीद राजबाला के परिवार तक को खेद भी नहीं जताया।

अब एक एक कर के अन्ना के साथी अपने आप ही बेनकाब होते जा रहै हैं तो इस में कोई क्या करे। जनता को बहकाने के लिये अन्ना ने हिसार में काँग्रेस का विरोध कर के दिखावटी लडाई भी कर डाली क्यों कि वह जानते थे कि एक सीट हारने से हरियाणा की कांग्रेस सरकार को कोई पर्क नहीं पडे गा। असल मुकाबला तो उत्तर प्रदेश में होना है जिस के लिये अन्ना ने अभी से कहना शुरु कर दिया है कि वह जन लोक पाल बिल आने के बाद कांग्रेस का प्रचार करें गे।

सभी जानते हैं कि काँग्रेस जन लोक पाल बिल भी अन्ना की झोली में डाल दे गी मगर उस से काला धन वापिस नहीं आये गा। अन्ना ने देश की जनता के आक्रोश को विफल कर के छ महीने का समय बरबाद कर दिया है और गाँधी बन गये हैं।

अगर अन्ना हजारे सच्चे सिपाही हैं तो अपनी भारत विरोधी मंडली को छोड कर स्वामी रामदेव, संध परिवार जैसे राष्ट्रवादियों का खुले आम समर्थन करें। फूट डालने का काम अन्ना और उन की मंडली कर रही है। अन्ना के साथ पिछली कतार के लोगों के चेहरे जब सामने आयें गे तो सभी कुछ साफ होने लगे गा अभी तो उन की टीम अपने आप ही अपने कपडे उतार कर नंगी खडी हो गयी है। 

चाँद शर्मा

हिन्दू विरोधी काला कानून

अगले आम चुनाव से पहले हिन्दूओं के प्रचार पर रोक लगाने और अल्प संख्यकों को बढावा दे कर अपने वश में करने के विचार से काँग्रेस एक काला कानून पास करवाने जा रही है जिस का नाम है – “सांप्रदायिकहिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011″।

वास्तव में यह कानून भारत में हिन्दूओं का हमेशा के लिये सर्वनाश कर दे गा और भारत को ऐक अलपसंख्यकों का खंडित देश बना दे गा।

विस्तरित जानकारी के लिये कानून को ही पढना पडे गा लेकिन यहाँ सरल भाषा में इस कानून के हिन्दू विरोधी पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है ताकि उन्हें आसानी से समझा जा सके। कानूनी भाषा के बदले केवल सारांश ही प्रस्तुत है।

कानून का मकसद हिन्दू विरोधी अल्पसंख्यक वोट बैंक कायम करना है।

कहने को इस का मकसद देश में सांप्रदायिक हिंसा को रोकना है, लेकिन इसका असली मकसद काँग्रेस के लिये और खास तौर पर सोनियां परिवार के लिये अल्प संख्यक वोट बैंक मज़बूत करना है। यह कानून पूरी तरह से दुर्भावना, पक्षपात एवं दुराग्रह से ग्रसित है और इस का प्रभाव हिन्दूओं के हाथ पाँव बाँध कर उन की पीठ में छुरा घोंपना है।

हिन्दू विरोधी दिमाग की उपज – जिस ड्राफ्ट कमेटी ने इस विधेयक को बनाया है, उसका चरित्र ही इस विधेयक के इरादे को स्पष्ट कर देता है। इसके सदस्यों और सलाहकारों में हर्ष मंडेर, अनु आगा, तीस्ता सीतलवाड़, फराह नकवी जैसे हिन्दू विद्वेषी तथा सैयद शहाबुद्दीन, जॉन दयाल, शबनम हाशमी और नियाज फारुखी जैसे घोर साम्प्रदायिक लोग शामिल हैं। विधेयक के इरादे क्या हों दे इस की आसानी से कल्पना की जा सकती है।

परिभाषाओं का छुपा मतलब – कानून में बहुसंख्यकों का अर्थ हिन्दूओं से है और अल्प संख्यकों में मुस्लिम, इसाई, तो आते ही हैं उन के साथ अनुसूचित जातियों और जन जातियों को जोडने का बन्दोबस्त भी हो गा। मतलब साफ है हिन्दूओं को तोड कर अनुसूचित जातियों को भी संरक्षण पक्षपात या किसी प्रलोभन के बहाने हिन्दू विरोधी बना कर अल्पसंख्यक वोट बैंक का विस्तार किया जाये गा।

विपक्षी सरकारों को तोडना – यह भारत के संघीय ढांचे को ही नष्ट कर देगा। सांम्प्रदायिक हिंसा के दौरान किए गए अपराध राज्यों के कार्यक्षेत्र में आते है। यदि प्रस्तावित बिल कानून बन जाता है तो केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकारों को हड़प लेगी। जिस प्राँत में भी केन्द्र विरोधी सरकार होगी उस में इस कानून की आड में केन्द्र सरकार पूरी दखलांदाजी कर सके गी।

हिन्दू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता – इस विधेयक के द्वारा न केवल बहुसंख्यकों अर्थात हिन्दूओं को आक्रामक और अपराधी वर्ग में ला खड़ा करने, बल्कि हिन्दू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता पैदा कर हर गली-कस्बे में दंगे करवाने की साजिश है।

हिन्दू विरोधी प्रावधान – इस कानून में ‘समूह’ की परिभाषा से मतलब पंथिक या भाषायी अल्पसंख्यकों से है, जिसमें अनुसूचित जाति व जनजाति को भी शामिल किया जा सकता है। अल्प संख्यकों में मुस्लिम, इसाई, तो आते ही हैं उन के साथ अनुसूचित जातियों और जन जातियों को जोडने का बन्दोबस्त भी हो गा। जरूरत पडने पर सिखों, बौद्धों, तथा किसी को भी भाषायी अल्पसंख्यक बनाया जा सकता है।

किसी भी बहुसंख्यक (हिन्दू) पर कोई भी अल्पसंख्यक नफरत फैलाने, हमला करने, साजिश करने अथवा नफरत फैलाने के लिए आर्थिक मदद देने या शत्रुता का भाव फैलाने के नाम पर मुकदमा दर्ज करवा सकेगा और उस बेचारे बहुसंख्यक (हिन्दू) को इस कानून के तहत कभी शिकायतकर्ता की पहचान तक का हक नहीं होगा। इसमें शिकायतकर्ता के नाम और पते की जानकारी उस व्यक्ति को नहीं दी जाएगी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही है।

केवल हिन्दूओं को त्रास्त करना

  •  शिकायतकर्ता अल्पसंख्यक अपने घर बैठे शिकायत दर्ज करवा सकेगा।
  • इसी प्रकार यौन शोषण व यौन अपराध के मामले भी केवल अल्पसंख्यक ही हिन्दू के विरुद्ध शिकायत दर्ज करवा सकेगा और ये सभी मामले अनुसूचित जाति और जनजाति पर किए जाने वाले अपराधों के साथ समानांतर चलाए जाएंगे। हिन्दू व्यक्ति को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है।
  • उसे एक ही तथाकथित अपराध के लिए दो बार दो अलग-अलग कानूनों के तहत दंडित किया जाएगा।
  • इस अधिनियम के अनुसार पीड़ित वही व्यक्ति है जो किसी समूह का सदस्य है। अतः कोई हिन्दू इस कानून के तहत पीडित व्यक्ति नहीं बन सकता। समूह के बाहर किसी बहुसंख्यक की महिला से अगर दुराचार किया जाता है या अपमानित किया जाता है या जान-माल की हानि या क्षति पहुचाई जाती है तो भी बहुसंख्यक पुरुष या महिला पीड़ित नहीं माने जायेगे । यह कानून हिन्दूओं को परिताडित करने के लिये ही बनाया जाये गा।
  • अपराध के फलस्वरूप किसी समूह का कोई व्यक्ति शारीरिक, मानसिक मनोवैज्ञानिक या आर्थिक हानि उठाता है तो न केवल वह अल्पसंख्यक व्यक्ति बल्कि उसके रिश्ते-नातेदार, विधिक संरक्षक और विधिक वारिस भी पीड़ित माने जायेगे !
  • दंगो के दौरान होने वाले जान और माल के नुकसान पर मुआवजे के हक़दार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। किसी बहुसंख्यक का भले ही दंगों में पूरा परिवार और संपत्ति नष्ट हो जाए उसे किसी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा।

सुरक्षा बलों में साम्प्रदायक्ता भरना

  • यह विधेयक पुलिस और सैनिक अफसरों के विरुद्ध उसी तरह बर्ताव करता है जिस तरह से कश्मीरी आतंकवादी उनके खिलाफ रुख अपनाते हैं। यानी अगर शरारती तत्व सुरक्षा कर्मियों पर पत्थर या हथगोले फैंके तो वह पीडित ही माने जायें गे और अपनी डयूटी करते हुये सुरक्षा कर्मी यदि बल का प्रयोग करें तो वह अपनी सफाइ देने के लिये दोषी बन कर कटघडे में ही खडे हों गे।
  • विधेयक में ‘समूह’ यानी अल्पसंख्यक के विरुद्ध किसी भी हमले या दंगे के समय यदि पुलिस, अ‌र्द्धसैनिक बल अथवा सेना तुरंत और प्रभावी ढंग से स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करती तो उस बल के नियंत्रणकर्ता अथवा प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए जाएंगे। स्थिति पर नियंत्रण जैसी परिस्थिति किसी भी ढंग से परिभाषित की जा सकती है।
  • किसी संगठन का कोई कार्यकर्त्ता या वरिष्ठतम अधिकारी या पद धारी अपनी कमान के नियंत्रण पर्यवेक्षक के अधीन अधीनस्थों के ऊपर नियंत्रण रखने में असफल रहता है तो इस अधिनियम के अधीन यदि कोई अपराध किया जाता है तो वह अपने अधीनस्थों द्वारा किये गए अपराध का दोषी होगा ! अर्थात किसी संगठन का सामान्य से सामान्य कार्यकर्त्ता भी इस अधिनियम के आधार पर यदि अपराधी सिद्ध होता है तो शीर्ष नेतृत्व भी अपराधी माना जायेगा । अगर निचले सत्र का कोई कर्मी जानबूझ कर या लापरवाही से किसी अल्पसंख्यक को नुकसान पहुँचाता है तो उस दल के अफसर को दोषी बनाया जा सकता है। अतः कोई अपने अफसर को नीचा दिखाने के लिये अपनी लापरवाही से उसे दँडित करवा सके गा। सशस्त्र बलों में अनुशासन हीनता को बढावा मिले गा।
  • सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए जिस सात सदस्यीय समिति के गठन की सिफारिश की है, उसमें चार सदस्य मजहबी अल्पसंख्यक होंगे। यदि समिति में अल्पसंख्यकों का बहुमत नहीं होगा तो समिति न्याय नहीं कर सकेगी।

समाचार पत्रों पर पाबन्दी और आतंकियों को छूट

घृणा या दुष्प्रचार –शब्दों द्वारा या बोले गए या लिखे गए या चित्रण किये गए किसी दृश्य को प्रकाशित, संप्रेषित या प्रचारित करना, जिससे किसी समूह या समूह के व्यक्तियों के विरुद्ध समानताय या विशिष्टतया हिंसा का खतरा होता है या कोई व्यक्ति इसी सूचना का प्रसारण या प्रचार करता है या कोई ऐसा विज्ञापन व सूचना प्रकाशित करता है जिसका अर्थ यह लगाया जा सकता हो कि इसमें घृणा को बढ़ावा देने या फ़ैलाने का आशय निहित है ! उस समूह के व्यक्तियों के प्रति इसी घृणा उत्पन्न होने की सम्भावना के आधार पर वह व्यक्ति दुष्प्रचार का दोषी है ! ऐसी प्रस्थिति में यदि कोई समाचार – पत्र आतंकवादियों के उन्माद भरे बयानों प्रकाशित करता है तो उसका प्रकाशक अपराधी मना जायेगा ! अर्थात फाँसी की सजा काट रहे आतंकवादियों का नाम प्रकाशित करने पर भी पाबंदी होगी ! आतंकवाद के खिलाफ परिचर्चा, राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन करना भी अपराध माना जायेगा जो कि संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार को भी बाधित करेगा !

किसी  बहुसंख्यक की किसी बात से किसी अल्पसंख्यक को मानसिक कष्ट हुआ है तो वह भी अपराध माना जायेगा। अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि अब अफजल गुरु को फांसी की मांग करना,बांग्लादेशी घुसपैठियों के निष्कासन की मांग करना, धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग करना भी अपराध बन जायेगा। मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक हानि कि मापने पा पैमाना क्या होगा यह स्पष्ट नहीं किया गया

भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुसार किसी आरोपी को तब तक निरपराध माना जायेगा जब तक वह दोषी सिद्ध न हो जाये; परन्तु, इस विधेयक में आरोपी तब तक दोषी माना जायेगा जब तक वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध न कर दे। इसका मतलब होगा कि किसी भी गैर हिन्दू के लिए अब किसी हिन्दू को जेल भेजना आसान हो जाएगा। वह केवल आरोप लगाएगा और पुलिस अधिकारी आरोपी हिन्दू को जेल में डाल देगा। इस विधेयक के प्रावधान पुलिस अधिकारी को इतना कस देते हैं कि वह उसे जेल में रखने का पूरा प्रयास करेगा ही क्योंकि उसे अपनी प्रगति रिपोर्ट शिकायतकर्ता को निरंतर भेजनी होगी।

विधेयक अगर पास हो जाता है तो हिन्दुओं का भारत में जीना दूभर हो जायेगा। देश द्रोही और हिन्दू द्रोही तत्व खुलकर भारत और हिन्दू समाज को समाप्त करने का षडयन्त्र करते रहेंगे; परन्तु हिन्दू संगठन इनको रोकना तो दूर इनके विरुध्द आवाज भी नहीं उठा पायेंगे।

अधिनियम का प्रभाव क्षेत्र – सम्पूर्ण भारतवर्ष होगा । जम्मू-कश्मीर में राज्य की सहमति से इसे विस्तारित किया जायेगा । जम्मू-कश्मीर में इस प्रकार का कानून आतंकवादियों और उन के सहयोगियों के लिये रास्ता आसान कर दे गा।

यह अधिनियम पारित किये जाने की तारीख से एक वर्ष के भीतर लागू होगा तथा एसे अपराध जो भारत के बाहर किये गए है उन पर भी इस अधिनियम के अंतर्गत उसी प्रकार कार्यवाही होगी जैसे वह भारत के भीतर किया गया हो !

काँग्रेस पार्टी पूर्णत्या  हिन्दू विरोधी है

एक वर्ष के भीतर लागू किये जाने की बाध्यता को रखकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान सरकार और राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वर्तमान अध्यक्षा के रहते ही यह कानूनी अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाय !

हिन्दूओं के लिये अब अभी नहीं तो कभी नही वाली स्थिति

हिन्दूओं को चाहिये कि इस काले कानून का संसद में, गलियों में मीडीया में सभी प्रकार से विरोध करें और सडकों पर उतरें।

इस कानून के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका डालें।

साम्प्रदायकता रोकने के लिये आसान रास्ता समान आचार संहिता लागू करना

सऱकार से माँग करें कि अगर देश में ऐकता लानी है तो समान आचार संहिता लागू करवायें जिस से अल्प संख्यक और बहु संख्यक का भेद अपने आप ही खत्म हो जाये गा।

किसी को ज्ञापन देने से कुछ नहीं हो गा। अब हिन्दूओं को फैसला करना हो गा कि देश को धर्म हीन बना कर दूसरों के हवाले करना है या फिर उसे हिन्दू राष्ट्र बना कर अपना अस्तीत्व सुरक्षित करना है।

चाँद शर्मा

हमारी ऐतिहासिक पहचान

यदि आप के बच्चे भारत का प्राचीन इतिहास जानने की कोशिश में आप से यह पूछें कि पौराणिक कथाओं में दिये गये नगर अब कहां हैं तो आप उन्हें क्या उत्तर दें गे ? क्या आप बतायें गे कि अब काशी का नाम वाराणसी, अयोध्या का नाम फैज़ाबाद, पाटलीपुत्र का नाम पटना और प्रयाग का नाम इलाहबाद है ? सुनने में आया था कि श्रीनगर, अवन्तीपुर और अनन्तनाग के नामों का इसलामीकरण करने पर भी विचार हो रहा है। यदि हम अपने ऐतिहासिक नगरों की पुरानी पहचान को पुनर्स्थापित करने की कोशिश करें तो काँग्रेसी, धर्म-निर्पेक्ष, साम्यवादी, कुछ इतिहासकार, ईसाई-मुसलिम संगठन और उन के प्रसार माध्यम एक स्वर में  इसे ‘भगवाकरण ’ कह कर विरोध करने लगते हैं। हमारा ही देश हम से छीन लिया गया है और हम लाचार बने बैठे हैं।

ऐतिहासिक सत्यता यह है कि मुसलमानों ने भारत में हज़ारों मन्दिरों और भवनों को ध्वस्त किया, लूटा, और उन पर कब्ज़ा कर लिया। प्रमुख मन्दिरों में से यदि काशी विश्वनाथ, मथुरा और अयोध्या को ही गिने तो पिछले कई दशकों से उन के बारे में विवाद कचहरियों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। अगर हिन्दुओं के विरुध कोई ऐसा मज़बी विवाद किसी मुसलिम देश में चल रहा होता तो वहां फैसला होने में क्या इतना समय लगता ? अयोध्या के विवाद ने कई बार उग्र रूप भी लिया है, कई लोगों की जान भी गई है तो न्यायालय में लगातार सुनवाई कर के क्यों नही इस को निपटा दिया जाता? कांग्रेसियों के लिये तो राम ऐक काल्पनिक पात्र थे – लेकिन हिन्दु समाज की आस्था तो राम के साथ उस समय से जुड़ी है जब इस्लाम नाम का कोई धर्म ही विश्व में नहीं था। मुग़ल विजेता बाबर हर दृर्ष्टी से भारत में मुसलसानों के लिये भी ऐक आक्रान्ता होना चाहिये था क्यों कि उस समय हिन्दुस्तान पर तो अन्य मुसलिम सुलतान इब्राहीम लोदी का शासन था। फिर राम की जन्म भूमि पर ऐक आक्रान्ता के बनाये हुये विवादित ढाँचे को क्यों रहने दिया जाये ? क्या मक्का–मदीना में कोई मन्दिर या गिरजा बन सकता है ? अगर नहीं तो फिर राम जन्म भूमि अयोध्या में भी किसी आक्रान्ता की कोई मसजिद नही होनी चाहिये।

आज भारत के सभी छोटे बड़े नगरों में सड़क के बीच में बने कई मज़ार देखे जा सकते हैं और कोई सरकार यातायात सुधारने के लिये भी उन्हें वहां से हटाने की हिम्मत नहीं कर सकती। लेकिन इस की तुलना में आज की काँग्रेसी सरकार राम-सेतु रक्षा समर्थकों से राम-सेतु निर्माण के सबूत मांगती है। सरकार के सहयोगी करुणानिधि ध्रष्टतापूर्वक टिप्पणी करते हैं कि राम ने कौन से कालेज से इनजिनियरिंग की डिग्री ली थी ? ऐसे नेताओं से अगर पूछा जाय कि आप के पास क्या सबूत है कि आप के दादा और पर-दादा भी कभी इस धरती पर जन्में थे ? अगर जन्मे थे तो फिर उन के सिक्के, शिलालेख क्यों नही हैं। अगर उन के पास पिछले दो – सौ वर्षों के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं तो राम के ऐतिहासिक प्रमाण कैसे दिये जा सकते हैं ? हिन्दू आस्थाओं के साथ इस तरह के खिलवाड़ क्यों सहन किये जा रहे हैं ?

भारत के प्राचीन इतिहास को खोजने के लिये हमें संस्कृत, पाली और तिब्बतियन भाषाओं  की प्राचीन पुस्तकों का अध्ययन करना होगा क्यों कि हमारे इतिहास के मूल ग्रंथ और स्थल तो मुसलसालों ने अपने शासन काल में ‘कुफ्र’ बता कर नष्ट कर दिये थे। भारत की धर्म निर्पेक्ष कांग्रेसी सरकार पुरानी मसजिदों, मकबरों और पाकिस्तान जा चुकी उर्दू भाषा का भारत में पुनर्वास और मदरस्सों के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। मसजिदों के मौलवियों को सरकारी कोष से वेतन देती है ताकि वह आने वाली मुसलिम पीढीयों को भी कुरान शरीफ़ पढा कर उन्हें हिन्दुओं के विरुध जिहाद करने की शिक्षा देते रहें। लेकिन अगर किसी सरकारी स्कूल के पाठ्यक्रम में व्यायाम के तौर सूर्य-नमस्कार आसन सिखाने, या ऐकता की भावना जाग्रत करने के लिये राष्ट्र गीत वन्देमात्रम् गाने को कहा जाये या विद्यार्थीयों को संस्कृत का कोई श्लोक कंठस्थ करवाया जाये तो वह शिक्षा का ‘भगवाकरण ’ कह कर आपत्तीजनक बना दिया जाता है। आखिर हम मुसलिम विरोध को इतना महत्व क्यों दे रहे हैं कि हम ने अपनी पुरानी पहचान से अपना नाता ही तोड़ लिया है ? हमारी नयी पीढी़यां अपने पुरखों के बारे में जानने के लिये अब किस देश में जायें गी ?

देश का बटवारा होने के बाद काँग्रेस की धर्म-निर्पेक्ष सरकार ने पाकिस्तान बनवाने के अतिरिक्त भारत का ही  ऐक अन्य प्रदेश कशमीर भी पूर्णतया मुसलमानों के हवाले कर दिया। भारत वासियों को कशमीर की सुरक्षा के लिये जान और कशमीर के पालन के लिये टैक्स तो देने पड़ते हैं लेकिन वह कशमीर में दो गज़ ज़मीन भी नहीं खरीद सकते। हज़ारों वर्षों से चले आ रहे कशमीर के मूल निवासी कशमीरी हिन्दुओं को जिहादी मुसलमानों ने वहां से मार काट के निकाल दिया और भारत की सरकार उन्हें वहां उन का हक़ वापिस नहीं दिला सकी। आज वैदिक साहित्य की जन्म भूमि कशमीर से हिन्दुओं का नामो-निशान मिटाने का प्रयत्न काँग्रेस की धर्म-निर्पेक्ष सरकार की छत्र छाया के नीचे ही हो रहा है और कशमीर को मुसलिम राज्य बनाया जा रहा है। आने वाली पीढी को यह विशवास दिलाना कठिन हो गा कि कभी अफ़ग़ानिस्तान हिन्दू देश था और उस का नाम आर्याना तथा गान्धार था। जैसे पाकिस्तान, बांगलादेश तथा नेपाल भी हिन्दू देश थे पर अब नहीं, इसी तरह अब कशमीर की बारी है और कांग्रेस सरकार की मनोस्थति और कार्य-क्षमता विशवास-जनक नहीं है।

जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के आग्रह पर कशमीर की मुस्लिम छवि बनाये रखने के लिये धारा 370 संविधान में रखवा दी थी किन्तु भारत की हिन्दू छवि के लिये क्या किया। आज राहुल को अपने आप को हिन्दुस्तानी कहने पर शर्म लगती है और उस की मां काँग्रेस प्रेजीडेन्ट की हैसियत से कहती हैं भारत हिन्दू देश नहीं है। क्या सभी काँग्रेसी हिन्दू विरोधी हैं? हिन्दूस्तान में इसाईकरण तो काँग्रेस के आशीर्वाद से ही हो रहा है।

अब इस से अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि केवल मुसलमानों को खुश रखने के लिये हम उन वीरों की गौरव-गाथाओं को अपनी पाठ्य-क्रम और सार्वजनिक गतिविधियों से निष्कासित करते जा रहे हैं जिन्हों ने अपने देश-धर्म की खातिर अपना जीवन दान किया। महा वीर हेम चन्द्र विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप, वीर शिवा जी, वीर बालक हक़ीकत राय का उल्लेख शिक्षा पुस्तकों में या तो होता ही नहीं या उन्हें ‘अकबर महान’ जैसों की तुलना में नीचे कर दिया जाता है। भारत के इतिहास को ‘धर्म-निर्पेक्ष बनाने’ के लिये तथ्यों को हटाने या भ्रामित करने का काम कुछ ‘धर्म-निर्पेक्ष ’ इतिहासकार तत्परता से कर रहे हैं। पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने और मुसलिम वोट बैंक को सन्तुष्ट रखने के लिये ‘धर्म-निर्पेक्ष” कांग्रेसी सरकार ने 1971 के भारत-पाक युद्ध तथा कारगिल युद्ध के उपल्क्ष में की जाने वाली परम्परागत सैनिक विजय-दिवस परैड को भी बंद कर दिया है। देश के वीरों की इस से अधिक उपेक्षा और क्या की जा सकती है ?

इस में कोई संशय नहीं कि जिहादी मुसलमानों को भारत के गौरव-मय प्राचीन इतिहास, वैदिक साहित्य और उन के विचार से ‘काफ़िर’ सूरमाओं से कोई सरोकार ना कभी था, ना है, और ना कभी होगा। भारत में रहते हुये भी वह अपने मार्ग दर्शन के लिये अरब देशों की और देखते हैं, हिन्दु विरोधी पाकिस्तान को अपना हितैषी मानते हैं और हिंसात्मक जिहाद कर के भारत में पुनः इसलामी राज्य स्थापित करने के स्वप्न देखते हैं। समूचे विश्व में मुसलमानों की यही मानसिक्ता काम कर रही है। आखिर क्यों कर हम अपनी उपलब्धियां, धार्मिक मर्यादायें, अपने पूर्वजों का यश, और अपने पहिचान चिन्ह अपने आप ही मिट्टी में मिलाते जा रहे हैं ? अपनी ऐतिहासिक धरोहर की रक्षा हम क्यों नहीं कर पा रहे ? क्या हमारा आने वाली पीढ़ी ओर कोई उत्तरदात्वि नहीं ? अगर है तो हमें अपने देश को हिन्दू राष्ट्र कहने और बनाने में कोई हिचकचाहट या भय नहीं होना चाहिये।

चाँद शर्मा

लोकपाल और जनलोकपाल के बदले राष्ट्रपति पद की गरिमा बढायें

भारत में भ्रष्टाचार जितना फैल चुका है उस स्थिति में हम ईमानदार व्यक्ति कहाँ से लायें गे जो लोकपाल या जन लोकपाल का पद सम्भाले गा ? अगर लोकपाल भी बेईमान निकला तो फिर क्या करें गे ? क्या और महालोकपाल बनायें गे ? या कहीं बाहर से आयात करें गे।

राजीव गाँधी भी तो मिस्टर क्लीन थे। मनमोहन सिंह तो ईमानदारी के प्रतीक माने जाते थे लेकिन उन दोनो के साये तले जितना भ्रष्टाचार फैला शायद भारत के इतिहास में उस की दूसरी कोई बराबरी नहीं है। फिर नया लोकपाल कोई अवतारी पुरुष होगा इस बात की कोई गारंटी नही हो सकती।

हमारे संविधान के अनुसार केन्द्र में राष्ट्रपति और राज्यों में राज्यपाल का पद सर्वोच्च है। उन पदों का काम केवल नाम-मात्र का है और खर्चा महाराजाओं जैसा। देखा जाय तो उन पदों का देश में कोई अधिकार ही नहीं है। केवल संवैधानिक अस्तीत्व ही है जिस का सरकार के काम काज पर कोई प्रभाव नहीं पडता। और तो और वह सरकार के मुख्य अंगों में जैसे कि संसद, कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका के अन्दर ताल मेल रखने की जिम्मेदारी भी नहीं निभाते। सबकुछ सेरिमोनियल ही है।

यदि राष्ट्रपति केन्द्र में और राज्यपाल अपने अपने राज्यों में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिये लोकपाल का कार्यभार सम्भालें तो उस में देश का कार्य अधिक सक्ष्मता से चले गा।

जरा सोचने की बात हैः –

  • जैसे आपातकाल के समय राष्ट्रपति देश का प्रशासन अपने हाथ में ले सकते हैं उसी प्रकार यदि प्रधानमन्त्री भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जायें तो राष्ट्रपति दूसरा प्रधानमन्त्री बनने तक देश का कार्यभार अपने हाथ में क्यों नहीं ले सकते ?
  • ऱाष्ट्रपति जिस प्रकार स्शस्त्र सैनाओं को आदेश दे सकते हैं उसी प्रकार वह सी बी आई को भी निर्देश दे कर भ्रष्टाचार की जाँच क्यों नहीं करवा सकते ?

अधिकाश तौर पर केन्द्र में सत्ताधारी पार्टी राज्यपालों के पद का विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिये ही दुर्पयोग करती है या उन पदों पर रिटार्यड राजनैताओं का पुनर्वास कर देती है ताकि वह अपने बुढापे का सामान आराम से इकठ्ठा करते रहैं और पार्टी के लिये सिरदर्द ना बने क्यों कि उन में से अकसर लोगों की छवि जनता में धूमिल हो चुकी होती है। उदाहरण देने की जरूरत नहीं जनता इस बात को अच्छी तरह समझती है।

आवश्यक होगा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की नियुक्ति प्रत्यक्ष चुनाव दूारा करी जाये और उन के पद की समय सीमा संसद के चुनाव से अलग हो। इन पदों के लिये राजनैतिक दल भाग ना लें सकें और जनता चरित्रवान व्यक्तियों को चुने।

लोकपाल या जन लोकपाल के बदले हमें संविधान में परिवर्तन करने पर विचार करना चाहिये ताकि नये पदों की जरूरत ही ना पडे। अभी जो स्थिति है उस में ना कभी नौ मन तेल होगा और ना ही कभी राधा नाचे गी।

चाँद शर्मा  

प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह की संदिग्ध क्षमता

कहने को प्रधान मन्त्री मनमोहन सिहं बहुत इमानदार प्रचारित किये जाते हैं परन्तु उन्हीं की कुर्सी की आड में सभी तरह के घोटाले हो रहै थे। वह अपने आप को मजबूर बता कर जनता की सहानुभूति लेना चाहते हैं परन्तु क्या वह कोई भी निर्णय लेने में सक्ष्म हैं ?

स्वामी राम देव के साथ जो बरबर्ता पूर्ण व्यवहार हुआ उस में उन्हों ने लाचारी दिखा दी थी। उस के बाद अन्ना हजारे को पहले तो जे पी पार्क में अनशन पर बैठने की मंजूरी दी गयी लेकिन फिर उन्हें गिरफ्तार कर के तिहाड जेल भेज दिया। अन्ना ने प्रधान मन्त्री को पत्र लिखा तो उन्हों ने जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस पर डाल दी। क्या सरकारें इस प्रकार पलटा खा जाती हैं ?

अन्ना ने केवल 6 दिन के लिये अनशन करना था जिस के लिये उन्हें केवल पाँच हजार समर्थकों को लाने की ईजाज़त दी गयी थी। सरकार ने यदि अन्ना को जेपी पार्क से हटा कर तिहाड जेल भेजा था तो वह निर्णय भी कुछ सोच समझ कर ही लिया हो गा। फिर उसे बदल क्यों दिया। अगर वह सही था तो अन्ना को 6 दिन के बदले 14 दिन तक अनगिनत समर्थकों के साथ रामलीला मैदान में अनशन करने की ईजाज़त क्यों दे दी गयी? क्या केन्द्र सरकार में निर्णय लेने की यही कार्य शैली है और सक्ष्मता है ?

यह तो बहुत साधारण सी बातें थी। अगर कल को हमारे देश पर परमाणु हमला हो जाये और तुरन्त निर्णय करने पडें तो क्या प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह समय रहते देश हित में कोई निर्णय ले पायें गे ? वैसी स्थिति में वह सोनियां जी को किस अस्पताल में ढूंडें गे – या फिर राहुल और उस की निजी सलाहकारों की सम्मति को बुलायें गे ? स्वामी रामदेव और अन्ना के विरुद्ध काँग्रेस का कहना रहा है कि केवल संसद को ही अधिकार है कि देश कैसे चलाना है। क्या सोनिया और राहुल संसद और संविधान से भी ऊपर हैं जिन्हें हर बात के लिये प्रधान मन्त्री पूछते हैं ?

जो बात आज भारत का हर व्यक्ति खुले आम कहता फिर रहा है क्या प्रधान मन्त्री को अब भी पता नहीं के काले धन के माफिया के अगुआ कौन है ? अगर पता है तो वह कारवाय़ी करने से हिचकचाते क्यों है । और अगर नहीं पता तो देश वासी फैसला करें कि इस प्रकार के प्रधान मन्त्री के निर्णय तले क्या देश सुरक्षित है ?

संविधान में प्रधान मन्त्री का पद सम्मानित होता है किन्तु जरूरी नहीं कि उस पद पर बैठने वाला हर व्यक्ति भी सम्मानित ही हो। व्यक्ति हित, पार्टी हित, और देश हित में से किसी ऐक को चुनने का फैसला तो वह अपनी ईमानदारी दिखाने के लिये कर ही सकते हैं।

चाँद शर्मा

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