About Hinduism and India

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Status of our National Identities

Among the educated population of India not more than ten percent know the meaning of National Anthem including Sonia Rahul and Manmohan Singh!

Hindus need to change not only the National Anthem, but also remove the name of MK Gandhi as Father of the Nation. We are not newly born child of 1947.

Further, either Congress party should change the color of its party flag, or the National Flag should be changed. Both should not resemble.

The name of the country should be same in English as well as in Hindi. Proper nouns do not change.

However, till Hindus have the courage and say in the Government nothing from the above can be expected. Therefore political unity among Hindus is the utmost requirement today. They should turn themselves into an effective vote bank to assert their views in India. Every Hindu should vow to throw out Congress party and its rule from India. Beginning should be made from elections in UP.

Chand K Sharma

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Preferential treatment (Sonia Gandhi) Sonia Vs Gandhi in Morality

Sonia Vs Gandhi in Morality

Except for surname Gandhi tag to promote herself in Indian political market, Sonia Gandhi, the present Congress President has nothing in common with MK Gandhi – the tallest leader of Congress.

The distinct differences are:

  • Gandhi patronized and wore Khadi – Sonia wears Khadi only to impress rural voters during elections.
  • Gandhi was committed to Ahimsa and was vegetarian – Sonia has not adopted even this basic and most relevant Gandhian thought in her life.
  • Gandhi did not amass wealth – about Sonia, the less said the better.
  • Gandhi resorted to mud packs, fasts and local remedies to cure his ailments, but Sonia has no faith and confidence even in India’s modern medical system. Therefore she preferred to enjoy health care abroad with family at public expense! She is determined to dismantle the India’s ancient infrastructure created by Swami Ram Dev and Acharya Balakrishnan in India by misusing brute authority of UPA Government.

Is it not a matter of Shame – utter shame, for Union Health Minister that despite six decades of their rule they have not created appropriate medical infrastructure upon which their own boss may have confidence? She was to be rushed abroad for her treatment while her voters struggle for their life in local Hospitals.

Sonia’s ailment is being kept a closely guarded secret. The country is entitled to know, for which serious disease the VIP was suffering and India had no facilities to cure her.

What steps the UPA Government is taking now at least, to ensure that VIPs like Sonia and other Congress ministers do not have to be rushed abroad in future. We cannot afford any risk as well as further expense for their life.

Last but not the least – Congressmen need to emulate Gandhian principles in private and public life rather misusing his name to fool voters.

Chand K Sharma

भारत की पढी लिखी महिलाओं को चुनौती

आज कल किसी भी शक्तिशाली देश का दूसरे देश पर सैनिक अधिकार बनाये रखना असम्भव हो गया है अतः दूसरे तरीके काम में लाये जाते हैं जैसे कि

  • आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना,
  • देश के योग्य नेताओं को गुप्त ढंग से मरवा देना,
  • देश की युवाओं में उन्हीं  के देश के साँस्कृतिक मूल्यों के प्रति अनास्था जगा कर उन्हें अपनी संस्कृति की ओर आकर्षति करना
  • या युवाओं को व्यसनों दूआरा पथ भ्रष्ट कर देना
  • इस के अतिरिक्त उस देश के शासन तंत्र में अपना कोई प्रशिक्षत जासूस घुसा देना जो उपयुक्त समय पर उस देश की सत्ता को बाहरी देश के निर्देशानुसार चलाये।

ऐसी परिस्थति में भला भारत कैसे अनछुआ रह सकता है?  साम्यवादी, मुसलिम, ईसाई और साम्राज्यवादी शक्तियाँ अपने अपने ढंग से भारत को खण्डित कर के उस पर अधिकार जमाने के लिये प्रयत्नशील हैं। पोप ने तो साफ घोषणा कर रखी है कि इक्कीसवीं सदी में उन का लक्ष्य सम्पूर्ण ऐशिया वासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना है।

‘इन्टरनेट’ पर जानकारी के मुताबिक सोनियां मेनिओ का जन्म इटली के छोटे से शहर ट्यूरिन के लुसियानो या ऒरबेसानो नामक गांव में 9 दिसम्बर 1946 को हुआ था। उन की दो बहिनें और भी हैं। उन के पिता पहले तो इटली के कुख्यात् तानाशाह मोसोलिनी की सैना में ‘फासिस्ट’ सिपाही थे और बाद में ऐक साधारण निर्माण कार्य से जुडे हुए ठेकेदार बन गये।

सोनियां मेनिओ की प्राथमिक शिक्षा घर के पास ही रोमन कैथोलिक मिशनरियों के स्कूल में हुई और बाद में वह ‘अंग्रेज़ी पढने के लिये’ केमब्रिज इंगलैंड गई। केवल ‘अंग्रेज़ी पढने के लिये’ एक साधारण परिवार की लड़की का इंगलैंड जाना हैरानी की बात है क्यों कि इतना तो इटली में मिशनरियों के स्कूल भी कर सकते होंगे। केमब्रिज में  ही उन की मुलाकात राजीव गाँधी से ऐक ‘ग्रीक रेस्तोरां’ में हई और पहली मुलाकात में ही प्यार हो गया!

1968 में वसन्त पंचमी के दिन सोनियां मेनिओ राजीव गाँधी से विवाह कर के  सोनियां गाँधी बन गयी। उस समय इन्दिरा गाँधी भारत के राजनैतिक पटल पर पूरी तरह अधिकार जमा चुकीं थी, और उन के छोटे बेटे संजय गांधी उन के उत्तराधिकारी के रूप में उभर रहे थे। 1971 में इन्दिरा गाँधी अमेरिका तथा पशचिमी देशों की आंख की किरकिरी बन चुकीं थीं। उन को गद्दी से उतारने के लिये आन्दोलन चला, फिर ऐमरजैंसी लगी, और आखिरकार इन्दिरा को हटा कर जनता पार्टी की सरकार बनी। लेकिन तीन वर्षों के अन्तर्काल में ही इन्दिरा गाँधी अपने बेटे संजय गांधी के साथ पहले से भी अधिक लोकप्रिय हो कर दोबारा प्रधानमन्त्री पद पर आसीन हो गयीं। इस समय तक सोनियां गाँधी एक सजी-धजी, भारत की प्रधानमन्त्री की बहू बन कर परदे के पीछे रहीं। जब जनता पार्टी की सरकार तले इन्दिरा गाँधी और संजय गांधी राजनैतिक मुशकिलों में फंसे तब पता नहीं क्यों सोनियां घबरा कर अपने पति और दो बच्चों समेत इटली के दूतावास में रहने चली गयीं थी।

अचानक इन्दिरा गाँधी के उत्तराधिकारी संजय गांधी की विमान दुर्धटना में रहस्यमयी मृत्यु हो गयी। संजय गांधी की महत्वकांक्षा पत्नी मानेका गांधी तथा पुत्र वरुण को प्रधानमन्त्री निवास से निष्कास्ति होना पडा, यहां तक कि जाते समय सोनियां और उन के पति राजीव गांधी ने मानेका गांधी के सामान की तलाशी भी ले डाली। यह घटना क्रम तो तेज़ी से चला पर पता नहीं 14 वर्षों तक किस अज्ञात भय के कारण सोनियां ने भारत की नागरिकता क्यों नही ली। 1984 में यह काम पूरा हुआ। अगर कोई साधारण सरकारी पदाधिकारी किसी विदेशी से विवाह करता है तो विदेशी व्यक्ति की रिपोर्ट सरकार को दे कर सरकार से पूर्वतः स्वीकृति लेनी पड़ती है लेकिन प्रधानमन्त्री के परिवार में ही इतनी देर क्यों लगी ?

संजय के बाद राजीव गांधी का राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ। किसी भावी सम्भावना से प्रेरित हो कर सोनियां ने अंग्रेज़ी के अतिरिक्त थोड़ी बहुत हिन्दी भी सीखी और भारतीय वेशभूषा भी अपनानी शुरू कर दी थी। अचानक 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमन्त्री निवास के अन्दर ही इन्दिरा गाँधी की हत्या कर दी गयी। हत्या के तुरन्त बाद ही पकड़े गये निहत्थे हत्यारे बेअन्त सिहं को भी प्रधानमन्त्री निवास पर ही मार दिया गया। पूरे घटना क्रम की जांच रिपोर्ट में शक की सुई प्रधानमन्त्री निवास के परिचितों के आस पास तो घूमती रही लेकिन कई रहिस्य सामने नहीं खुल पाये।

प्रधान मंत्री पद के लिये ‘मिस्टिर क्लीन’ होना ही राजीव गांधी का राजनैतिक आधार था । भारत दर्शन पर जनता के बीच सोनियां ने भी जाना शुरू कर दिया लेकिन मंज़िल अभी दूर थी। राजीव गांधी की ‘मिस्टिर क्लीन’ छवि बिगाडने में सब से प्रमुख हाथ सोनियां के करीबी क्वात्रोची का रहा जो आज सभी झंझटों से मुक्त हो कर बोफर्स तोपों के सौदे की दलाली हज़म कर रहा है और भारत सरकार केवल दिखावे के तौर पर हाथ मलती रह गयी। ‘मिस्टिर क्लीन’ अपने मुंह पर कालिख पुतने के कारण सत्ता से बाहर हो गये। सत्ता में वापसी के लिये चुनाव प्रचार की जिस रैली में वह पहली बार सोनियां के बिना अकेले गये थे उसी रैली में 21 मई 1991 को उन की भी हत्या कर दी गयी। काश उस दिन सोनियां उन के समीप रही होतीं तो शायद विनाश से बच गये होते।

आसमान का छप्पर फट चुका था अतः आनन फानन ही राजीव गांधी की अंत्येष्टी होने से पहले ही कांग्रेसी चाटुकारों की टोली ने सौ वर्षों से अधिक पुरानी पार्टी की प्रधानता सोनियां गाँधी के कदमों में डाल दी जिस के लिये केवल साधारणतया अंग्रेजी-हिन्दी पढी सोनियां तैयार ही नहीं थी। नये नये वित्त मन्त्री बने मनमोहन सिहं ने तो राष्ट्रीय बजट से 200 करोड रुपये भी निकाल कर शोक संत्पत सोनियां की झोली में डाल दिये ताकि वह राजीव गांधी फाऊडेशन संस्था चला कर अपनी वेदना कम कर सकें, परन्तु जब विरोध हुआ तो सोनियां ने वह अनुदान अस्वीकार कर देना ही उचित समझा। उन को सक्रिय राजनीति में शामिल होने के न्योते मिलने लगे । उन का निवास स्थान प्रधान मन्त्री नरसिम्हा राव से रुष्ट नेताओं को सांत्वना देने का केन्द्र बनने लगा। कभी कभी सोनिया राय-बरेली और अमेठी जैसे पारिवारिक तीर्थ स्थलों के चक्कर भी लगाने लगीं जिस से उन के राजनीति में प्रविष्ट होने की अटकल पच्चू अफवाहें गर्म रहने से य़ोग्य एवं सक्ष्म प्रधान मन्त्री नरसिम्हा राव की कुर्सी डोलने लगी।

नये कांग्रेस प्रधान सीताराम केसरी बैंड मास्टर थे, तथा कांग्रेस का ढोल पीट कर चन्दा इकट्ठा करने का काम करते थे। उन्हों ने सोनियां के आगे घुटने टेक कर अद्यक्षता सोनियां को ही सौंप दी। शरद पवार, संगमा और तारिक अनवर ने सोनियां को विदेशी मूल की होने का बता कर विरोध करने की हिम्मत जुटायी तो वह तीनों दूध में से मक्खी की तरह कांग्रेस से एक ही झटके से निकाल दिये गये। गद्दी सम्भालते ही पहली बग़ावत को सोनियां ने क्रूरता से कुचल दिया ता कि दूसरा कोई हिम्मत ही ना कर सके। कुछ ही देर बाद शरद पवार की सारी हेकडी निकल गयी और वह सोनियां को भारतीय मान कर मन्त्री पद पा कर ही सन्तुष्ट हो गये और प्रधान मन्त्री बनने के सपने छोड कर क्रिकेट की राजनीति से ही अपना मन बहलाने लगे।

परदे के पीछे ही सोनियां ने कांग्रेसियों की गर्दन पकडनी सीख ली थी। साथ ही अपनी सासू जी के हाव-भाव भी अच्छी तरह से अपना लिये थे। जनता के सामने खादी की साडीयां पहनना, भीड को देख कर हाथ हिलाना, केमरे के सामने अधनंगे बच्चों के गाल थपथपाना तथा गरीबी हटाओ तरह के नारे लगवाना अब वह बहुत अच्छी तरह से सीख चुकीं थीं। इस लिये अब सरकार को आंखें दिखाने का वक्त आ गया था।

कांग्रेसियों में सिवाये गाँधी नेहरू नामों के कोई दूसरा आसरा ही नहीं था इसलिये सोनियां के साथ गांधी शब्द जुड जाने से सभी वरिष्ट कांग्रेसी नेता भी सोनियां जी से हाथ जोड कर मार्ग-दर्शन का अनुरोध करने लगे। जिस तरह शतरंज की बिसात पर कोई प्यादा चलते चलते वज़ीर बनने लगता है इसी तरह राजेश पायलट और माधव राव सिन्धिया भी शायद सोनियां को चुनौती दे पाते मगर वह दोनो अलग अलग दुर्घटनाओं का शिकार हो कर परलोक सिधार गये। ऐक तीसरे प्यादे जितेन्द्र प्रसाद ने सोनियां के सामने अध्यक्ष पद का चुनाव लडने का दुःसाहस तो किया लेकिन उस की इतनी दुर्गति हुयी कि चुनाव हारने के थोडे ही समय  पशचात वह भी सीने में दर्द ले कर स्वर्ग सिधार गये। सोनिया को चुनौती देने वाला अब कोई नही बचा था।

सब तरह से निशचिन्त हो कर सोनियां ने पहली बार जोड़ तोड़ कर के की सरकार तो ऐक वोट के अन्तर से गिरा दी लेकिन वह अपनी सरकार बनाने में सफल ना हो सकीं। निर्वाचन के बाद वाजपायी की सरकार पूरे कार्यकाल तक चली।

आखिरकार बिल्ली के भाग्य से छीका टूट ही गया। आम चुनाव के पशचात कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा मिल जाने से कांग्रेस तले सरकार तो बन गयी लेकिन सोनियां प्रधान मन्त्री ना बन सकीं। खबरें निकली कि राष्ट्रपति भवन की ओर से कुछ आपत्ति हुयी थी। जब अंगूर खट्टे निकले और सोनियां स्वयं प्रधान मन्त्री न बन सकीं तो इसे कुर्बानी का रंग दे कर वाह-वाही समेटी गयी। समस्या विकट थी। प्रधान मन्त्री बनने के बाद अगर उसी व्यक्ति ने यदि सोनियां को ही आंखें दिखा दीं तो ? सब ऊंच-नीच सोच कर  सोनियां ने ऐक ऐसा अस्तीत्वहीन व्यक्ति ढूंड लिया। अस्तीत्वहीन की तरह केंचुए को कहीं से भी मोड लो और जब चाहो पैर से मसल डालो। परदे की ओट से शासन करने पर बिना किसी जिम्मेदारी के सम्पूर्ण अधिकार भी प्राप्त हो गये, और बोझ उठाने वाले  में कोई हड्डी ही नहीं थी।

मनमोहन सिंह के मंत्री मण्डल के सभी प्रमुख मंत्रालय आज उन कांग्रेसी नेतोओं के हाथ में रहै जिन की जनता में कोई निजी साख नहीं है। वह केवल सोनियां की मेहरबानी से राज्यसभा के रास्ते से केन्द्र सरकार में ला कर बैठा दिये गये थे। दूसरे प्रमुख मंत्रालय उन नेताओं के पास रहै जो सरकार के घटक दलों से हैं और उन्हों ने केन्द्रीय मंत्री-पद काँग्रेस के साथ सांठ गांठ करने के ऐवज़ में सोनियां की स्वीकृति से मिला था। अतःसरकार का असली निर्देशन सोनियां के हाथ में रखने के लिये ऐक अत्यन्त शक्तिशाली पद बनाया गया जिसे यू पी ऐ चेयरपरसन कहा जाता है। इस पद के पास केन्द्रीय सत्ता के वास्तविक अधिकार हैं लेकिन ज़िम्मेदारी का बोझ मनमोहन सिंह के सिर पर ही है।  सभी प्रदेशों में जहां कांग्रेसी सरकारें थीं वहां पर मुख्य मन्त्री ईसाई या मुसलिम तैनात किये गये। सच्चर कमिशन की सिफारशें लागू कर के सोनियां ने मनमोहन सिंह के मुहं से कहलवा दिया कि अब देश के साधनों पर अल्पसंख्कों का पहला अधिकार है। हिन्दु समुदाय को कोई शक नहीं रहना चाहिये कि अब उन के पूर्वजों के देश पर किस का अधिकार है।

सोनियां के साथ जिन का सीधा सम्पर्क है वह सभी ईसाई तथा कट्टर हिन्दु विरोधी हैं। ऐ के एन्थोनी रक्षा मन्त्री, अम्बिका सोनी कांग्रेस महा-सचिव, आस्कर फरनाडिस केन्द्रीय नीति निर्धारण मन्त्री, मारग्रेट अलवा महाराष्ट्र प्रमुख, वालसन थाम्पु केन्द्रीय शिक्षण बोर्ड प्रमुख, जान दयाल सोनियां के मनोनीत नेशनल इन्टीग्रेशन काऊसिल सदस्य तथा कांचा इलाया यू एन ओ में भारत सरकार के सलाहकार हैं। पाठ्यक्रम की पुस्तकों में से भारतीय इतिहास को भ्रामित बनाने का काम तेज़ी से चल रहा है। भारत में चुपचाप ही ईसाईकरण तेज़ी से हो रहा है और भारतीय मनोरंजन के साधनों में खोये हुए हैं।

भारत के लिये वह ऐक मनहूस दिन था जब मनमोहन सिहं ने सोनियां के हुकम से प्रधान मन्त्री  पद की शप्थ ली और इटली वासियों के लिये ऐक गर्व का दिन था कि उन के देश की ऐक मामूली अंग्रेज़ी हिन्दी पढी महिला संसार के सब से बडे प्रजातन्त्र की कर्ता धर्ता बन बेठी । छवि प्रचार के लिये सरकारी खर्चे पर रोज़ सोनियां गांधी की फोटो वाले विज्ञापन हर दिन अखबारों में छपने लगे हैं।

शर्म की बात है कि बिना आरक्षण के ऐक साधारण हिन्दी – अंग्रेजी जानने वाली ऐक विधवा स्त्री विश्व के सब से बडे प्रजातन्त्र की कर्ता धर्ता बन सकती है लेकिन भारत की उच्च शिक्षा प्राप्त महिला इटली की प्रधान बनने का सोच भी नहीं सकती। उन्हें अपने देश में भी आरक्षण चाहिये। कम से कम अपने देश को तो सम्भाल लो। अब भी वक्त है जाग जाओ।

चाँद शर्मा

India turning into a satelite state of US

Ahead of a crucial Indo-US strategic dialogue, Robert Blake, the Assistant Secretary of the US for South and Central Asia has said that it no longer considers India a non-aligned country, “I do not consider India a non-aligned country any more. I think that really changed after 9/11 where India really realised that it has a wide range of common interest with the United States,…”

With this kind of statement being made the UPA Government is required to explain Indian public to what extent Prime Minister Manmohan Singh has accepted India to be a tailpiece of USA?

Has the present UPA Government given up the policy of Non alignment that Nehru had enunciated in fifties?

Chand K Sharma

Empowering non political President can be effective alternative to Lokpal !

Empowering non political President can be effective alternative to Lokpal !

Constitutionally, The President of India is the Head of State. The President appoints Prime Minister and top functionaries to run the Government, such as Cabinet Ministers, State Governors, Ambassadors, Supreme Court Judges, Defense Service Chiefs, Election Commissioners, Members of the UPSC, Chief Vigilance Commissioner. His primary function is to oversee that all functions of the state are carried out according to the Constitution. When government cannot be run as per the Constitution he has Emergency powers to dismiss an elected government and promulgate Presidential Rule.

This all sounds perfect and impressive on paper, but practically the President acts on the advice of the Prime Minister. His appointment is only ceremonious, to execute the dictates of Prime Minister. He simply reads aloud the policy statement speech prepared by the PMO before the first session of the Parliament.

The relative importance of Presidential Office and PMO can be inferred from the fact that opinion sought from Home Ministry by the ex President Dr APJ Abdul Kalam regarding disposal of mercy petition of twice convicted terrorist Afzal is still pending for the last many years unanswered while the President retired almost three years ago.

Why do we have such an expensive ceremonial institution? Why not to empower this grand office for better performance in our democracy? It will be worthwhile to invest The President with power to dismiss any functionary of the Government appointed by him if they get impugned on the charges of corruption. For such matters the President should be guided by his own wisdom or expert opinion at his choice. If we repose faith on this august institution we can dispense with the idea of proposed Lokpal.

At present Prime Minister being the leader of political party having majority in Parliament is guided by the political dictates of his party. His advice to the President also reflects partisan approach on all matters including corruption. It is therefore necessary for the health of democracy to free the President from the clutches of Prime Minister when the latter himself comes under clout.

A President elected directly by all citizens of the Country, as in USA, can over see cases of corruption against any authority including Vice President, PM and Higher Judiciary. He may be able to dismiss them if required. No doubt it will result in setting up of two centers of Power – The Prime Minister and the President. But aren’t we are contemplating to have a third centre Lokpal to oversee Judiciary, Prime minister and every one else?

To elect a non political President, there should be no canvassing of candidates by political parties or business houses. Persons should be eminent personalities, physically fit, well educated, and with clean reputation in the country like some of our past Presidents like Dr Rajendra Prasad, Dr S Radhakrishnan and Dr APJ Abdul Kalam. Election Commission should place the data of all aspirants on the internet. Public discussions for the suitability may go on for a year or so giving fair chance to every candidate at no election expense. Some modalities shall have to be worked out for restricting the number of posts.

Unless we place robots as Presidents and Prime Ministers, human weaknesses cannot be totally eliminated from both. Normally such a grand person as President will not get involved in corruption, but if that be so, the Parliament can remove him under the existing system of impeachment. Removal of corrupt Prime Minister shall rest with the President if he is reasonably satisfied with prima facie evidence.

The Presidential Election and Elections for the Parliament should be staggered so that some governance machinery is in office at all the time. A President may have the power to appoint National Cabinet whenever elected cabinet is not in place.

Whatever is said about the President in the above context, can be made to apply to the Governors of states also. It will be an effective and better remedy than Lokpals.

Politicians are not likely to agree and part with their existing powers and avenue to rehabilitate useless politicians in glittering office. Brushing them aside, the Constitutional experts and intelligentsia may examine this proposal with open mind, and press further if convinced.

Chand K Sharma.

Lokpal Bill alone will not end Corruption and Black Money!

Message body

Doing his acrobatics alone Anna Hazare has met Sonia Gandhi to press inclusion of PMO under the ambit of Lokpal. Assuming Sonia blessed the wish – than?
Getting the Lokpal Bill passed in Parliament will be further Herculean task and the Bill will lie buried there. There will be all party meetings, walkouts and adjournments till the session will be over. Assuming further Anna got his own draft passed and promulgated as Act – then, thereafter?
Today  in the set up of our democracy, Congress Supremo Sonia has persons of her choice as President, Vice President, Prime Minister, Cabinet Ministers, a Yuvaraj in waiting, Chief Ministers, Chief Election Commissioner, and various other key functionaries to hold posts including a tainted Chief Vigilance Commissioner. Same way, can’t she have a Lokpal also of her choice, then what will an Anna obliged by Sonia ji would do? Who will  bell the cat to question her diktat?
Well, we are still optimist to assume further and one of the four stalwarts in Anna’s drafting committee is appointed as Lokpal to reconcile Anna. The Lokpal will have to rely upon the existing set up of investigating agencies like police, CBI, ED, and perhaps some new outfits to be assembled in hurry. Surely, such setups will not turn super honest and super efficient and they will continue to function as they have been groomed. How will they get culprits convicted through the existing judicial set up?
Assuming this hurdle is also jumped across. Due to inadequacy of punishment and provisions for confiscation of black money abroad will let the crafty offenders go Scott free; unless convicts undergo speedy trials with onus of proving their innocence. There should be no lessor punishment than declaring their black money as public property and death to the accused.
This is exactly what Swami Ram Dev has been demanding as the first step through an ordinance that could have been issued on 4 th June 2011. Anna is merely fooling himself with partial demand that in course of time the Government will meet to show its own serious concerns on the burning issue. This will divert the main issue raised by Swami Ram Dev.
Public knows that nothing will happen as long as we are seeking self prosecution of UPA Government by sitting in hunger strikes. UPA Government has already sent a clear message on the night of 4 th June. Anna Hazare may sit on hunger strike on 16 August 2011 to the dooms day!
BJP the opposition party now come forward to declare on the floor of Parliament that they will hang the culprits of 4 June atrocities and custodians of black money publicly at Ram Lila Ground if People of India voted them to power with requisite majority. The Election result will then act as a referendum to put their promise into practice.  It will tell the world all over that in democracy the real power of government really resides in the mandate of people.
Having given this open warning the opposition should get down to prepare for general elections and forming public opinion to vote for total eradication of corruption and corrupt elements. Now only courage and unity of opposition and public will end corruption and not Anna Hazare’s out dated techniques of fasts.
Lokpal Bill alone will not end Corruption and Black Money!
Chand K Sharma

Let us start cleaning our homeland

There is no other identity of India than it is the home for Hindus. It was never un-inhabited piece of land  to be called NO MAN’s LAND like Antarctica. Conspirators are now at work in India and abroad to declare India for all migrants, infiltrators, and aggressors in the fake name of secularism. Nepal was the last reminiscent as a  Hindu country, but today its identity has been obliterated. Do we want the same to happen in India? Sonia has already said that India is not a Hindu country and Rahul said that he is ashamed to be an Indian.

Unless Hindus get backing and support from the Government the real dangers to our homeland cannot be eliminated. At present pseudo Secularism backed by communism and minorities is the real threat. Country’s resources and power lies in the hands of selfish, uncouth and inefficient politicians who are manipulative to grind their own axe . Persons like Mulayam Singh, Amar Singh, Laloo Yadav, Ram Vilas Paswan, Mayawati, Karunanidhi, Jayalalitha, Chandrababu Naidu, Om Prakash Chautala, Farooq Abdullah and Sharad Pawar get elected as our national leaders. All of them have contributed directly or indirectly towards the emergence of anti Hindu forces. Sonia Manmohan combine is determined to destroy cultural roots of Hindus from India by misusing secularism. The were out to destroy Ram Setu, recognised gay relationships, and are now working to usurp temple funds. They dare not interfere with the personal law of minorities even for the sake of national integration but are dressing up interfere with Hindu law to regulate so-called love marriages. By granting favors on the basis of castes, minority subsidies and such other things they are weakening the unity among Hindus. We have to choose between pseudo secularism and Hinduism – that welcomes all those who accept live and let others also live within the constraints of cultural identity of the Country.

Thus we need to have  a pro Hindu Government in India that  can restructure our national history, provide  facilities  for  research and propagation of our heritage to the new generation through schools, colleges and  other outlets. The government alone can plug the activities of anti Hindus like conversions, and propagation of non-Hindu sects in India.

We cannot import honest leaders from outside nor can we raise a new honest party of such people of our own choice. We shall have to choose from whatever is available today. Whether we like it or not, at present BJP is the only All India party, by the patriotic organization network of RSS. Thus we should align with BJP which is the only hope left to counter the forces that are destroying our homeland. Even if they are not the best, yet they are better than deceitful secular outfits.

Hindus must unite politically. Change of government can only be affected through ballots.  We need to consolidate Hindu votes to install a government at the center and states which is capable of amending the constitution to declare our country a Hindu state.

For this purpose, without waiting help from others, individually we can do the following:-

1.    Build public opinion by writing to news papers and other media sites. We should oppose subsidies and reservations being given to non Hindus in India at the cost of tax payers. If not through the media, at least we may propagate amongst own friends, relations, servants, social circles and encourage them to vote for one Hindu political party. We should have more frequent Hindu get together at home, Parks, and Temples to have person to person contact and coordination.

2.    We should have more frequent Hindu get together and person to person contact for motivation and coordination. Make every Hindu aware that he must cast his vote in favor of Hindu candidates of one collectively decided political party. At this time there is no outfit other than BJP and emerging Bharat Swabhiman. Since the struggle has to be won through ballot, we should spare time to participate in such gatherings and offer our efforts and resources. Division of Hindu votes should be avoided at all costs

3.    We must work towards the defeat of leaders who are defectors, propagate castes, regionalism, minority appeasement and communism in the country. Also we should aim the defeat of pseudo“secular candidates” who are hidden snakes.

4.     We may practice utmost care in employment of Non Hindu domestic helps, employees, tenants and similar contacts. We should also refrain from watching films of those persons who often propagate anti Hindu ideology in the name of art.

5.    We need to motivate our children to join IAS cadres, Armed forces, Police services and other government institutions.  Otherwise one day we may discover to our dismay that de-facto governance of the country has already passed on to the non Hindus.

6.    We need to inculcate Hindu customs at Birthdays, marriages and other celebrations. As far as possible format of celebrations should be simplified and made affordable to all.  Festivals should be celebrated at the community place to foster unity. Elderly persons should conduct interactive lectures about the importance of the event to familiarize younger generation at schools, hostels and community centers.

7.    NG Hindu Organisations must provide for library of Hindu scriptures, a yoga or health club near the community services like temples. We must boycott newspapers, TV channels, film stars and other persons who are known to be anti Hindus. Anti Hindu media are the source of contamination.  They should be replaced at our homes by national media. Most of us are not aware about the lurking dangers for Hindus.

The above are just few suggestions and more ideas can be generated to suit local conditions. The central theme is that India is our home that me as Hindus have to protect.  Instead of crying aloud for others to help, we must get down to work individually and start cleaning our house single-handedly from today itself. Other will also follow. Movements start that way only.

Regards,
Chand K Sharma

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