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आज ज़रूरत है भगवान परशुराम की

भगवान परशुराम जयन्ती केवल एक जातीय पर्व बन कर रह गया है क्यों कि सिर्फ ब्राह्मण समाज ही हर वर्ष भगवान परशुराम जी के जन्म – दिवस को औपचारिक रूप से समस्त भारत में मनाता है और फिर अगले वर्ष तक उन्हें भूल भी जाता है। उन के चरित्र का सही मूल्यांकन तथा प्रदर्शन आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग के सामने नहीं किया गया है।

भगवान परशुराम ऐसे युग पुरूष हैं जो त्रैता युग (रामायण-काल) से दुआपर युग (महाभारत काल) तक उल्लेखनीय रहे हैं, लेकिन उन को एक महा क्रोधी के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है। अकसर राम लीलाओं में ऐक सनकी किस्म के पात्र के रूप में दर्शक लक्षमण परशुराम संवाद की नोंक झोंक का आनन्द ले लेते हैं। सत्यता यह है कि वालमीकि रचित रामायण में ऐसा कोई दृष्य चर्तित नहीं है, परन्तु गोस्वामि तुलसीदास रचित राम चरित मानस में लक्षमण परशुराम संवाद दिया गया है। लगता है उसी को आधार बना कर नाट्यकारों ने मसालेदार संवाद और जोड दिये होंगे जिस के कारण भगवान परशुराम जैसे प्राकर्मी एवम् सदाचारी युग पुरूष का व्यकि्तत्व केवल ऐक भ्रामित रूप में सिमट कर रह गया।  

कहा जाता है परशुराम जी ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि की मृत्यु का बदला लेने के लिये इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। परन्तु यदि इस बात को सत्य माना जाय तो फिर रघुकुल के महाराज दशरथ और मिथिला के महाराज जनक कैसे उन के क्रोध से बच गये ? परशुराम जी क्षत्रिय राजकुमार राम के आगे क्यों नत्-मस्तक हो गये?

यह भी कहा जाता है कि परशुराम जी ने क्षत्रियों को शस्त्र विद्या ना सिखाने का प्रण भी लिया था जिस के कारण कर्ण को ब्राह्मण बन कर उन से छल कर के ब्रह्मास्त्र प्राप्त करना पड़ा था और भेद खुल जाने पर कर्ण को शाप ग्रस्त भी होना पड़ा था। परन्तु यदि उन्हों ने कोई ऐसा प्रण लिया होता तो वह क्षत्रिय महारथी भीष्म को अपना शिष्य स्वीकार कर के शस्त्र विद्या कभी ना सिखाते।

वास्तव में परशुराम जी ने पथ भ्रष्ट शासक वर्ग के अन्याय और दुष्चरित्र का दमन किया और कुछ क्षत्रियों को उन के अधर्म और अत्याचार के कारण दँडित किया था। वह क्रोधी नहीं थे, अपितु संवेदनशील हो कर उन्हों ने अम्बालिका के साथ हुये अन्याय का प्रतिकार लेने के लिये भीष्म पितामाह जैसे महारथी से युध भी किया था। उन्हों ने ही सर्वप्रथम संत-सिपाही का कीर्तिमान स्थापित किया। बाद में अंग्रेज़ी साहित्य में भी इसाई धर्म की परम्पराओं और इसाई अबलाओं की रक्षा के लिये नाईट्स उल्लेखनीय पात्रों के रूप में चर्चित हुये। सिख गुरू जनों ने भी पीरी और मीरी की परम्परा अपनायी।

भ्रान्तिवश आज केवल जन्म के आधार पर ही जातीय वर्गीकरण किया जाता है और कर्म तथा शैक्षिक योग्यता को अनदेखा कर दिया जाता है। केवल जन्म के आधार पर अपने आप को ब्राह्मण कहने वालों में से कई व्यक्ति दुराचर्ण भी करते हैं, शैक्षिक योग्यता से ब्राह्मण कहलाने वाले दुष्कर्म होते देख कर उसे अनदेखा कर देने में ही अपनी सुरक्षा और भलाई समझते हैं। क्या इस प्रकार के ब्राह्मणों को भगवान परशुराम का वंशज कहलाना शोभा देता है? अतः आज के संदर्भ में शिक्षत वर्ग के लोगों को अपने सामाजिक उत्तरदाइत्व का मूल्यांकन करने की अति अधिक आवशक्ता है।

आवशक्ता है कि सही मायनों में देश के शिक्षित वर्ग के लोग सामाजिक अन्याय, अपराध और पथभ्रष्ट शासक वर्ग के विरुध भगवान परशुराम की दिखाई हुई राह पर चल कर दिखायें। संवेदनशील बनें, सामाजिक बुराईयां देख कर भी निष्क्रिय ना रहें, हताश होने के बजाये क्रियावन्त हो कर उन्हें नष्ट करने के लिये अग्रसर हों। आज भारत को फिर से ज़रूरत है भगवान परशुराम के सच्चे वंशजों की ।

अगर आज के युग में भगवान परशुराम होते तो वह भ्रष्ट नेताओं और काँग्रेस के धर्मनिर्पेक्ष नेताओं का संहार अवशय करते जिन्हों ने देश और धर्म को अपनी आचार हीनता से क्षतिग्रस्त कर छोडा है। आज भारत को स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के साथ भगवान परशुराम की भी सख्त ज़रूरत है।

चाँद शर्मा

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